रत्नाकर अर्थात गोलोकवासी श्री जगन्नाथदास रत्नाकर के सम्पूर्ण काव्यों का संग्रह | Ratnakar Arthat Golokavasi Shri Jagannathdas Ratnakar Ke Sampurn Kavyon Ka Sangrah
श्रेणी : साहित्य / Literature

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लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
8 MB
कुल पष्ठ :
614
श्रेणी :
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)( ११ )
छाई छवि स्यामल सुद्दाई रजनी-मुस की, _ ,
रच पियराई रही ऊपर भुरेरे के
कहे रतनाकर उम्तगि तरु छाया चलो, দি
चढ़ि अगवानी द्वेत आवत अधेरे के ॥
घर घर साजै“ सेज अगना सिंगारि अंग,
लौटत उमग भरे विछुरे सबेरे फे।
जोगी जती जगम जदाँ ही वहाँ डेरे देत, है
फेरे देत फुदकि विहमम बसेरे के ॥
(सध्या)
इन अध्टकों में तथा सैकड़ों फुटकर कबितों में रत्नाकर ज्ञी का
कलाबिद् सूप अधिक स्पष्ट है। ये वे कवित्त हैं जो उनके जीवन काल, में
सैकड़ों वार कवि-सम्मेलनों मे श्रोताओं की वाइवादी श्राप्त फर चुके है । क्यों
न हो। इनकी कार्रीगरी ऐसी ही है । रत्नाकर जी के छोटे छोदे कवि-सम्मेलन
अधिक प्रिय थे। कवि-सम्मेलन नहीं, उन्हे कवि-सडली कहना अधिक उपयुक्त
हागा। इन्हीं में वे अपनी मेंजी कलम के निखरे कवित्त सुनाया करते थे। इन
झबिततों का संगीत “उद्धवशतक” कौ कोरि का नदी है, उससे अधिक हलका और
उत्तेजक दै शरीर उतना मनोरम तथा वेदनामय मी नदीं) इन्दी में उनके
घीराप्टक के कवित्त भी है! जिन्हें पद्कर एक पत्र-संपादक मे लिखा था कि--
४रत्वाऊर जी भूषण के युग मे रदते दै ॥» परंतु यह् रत्नाकर जी फ प्रकृति
का विप्रयेय है। उनफे वोररस के छर्दों में अधिकांश अलञभूतिद्ीन हैं ॥ यह
थुय “भूषण का युग” कहा जा समता है। पर बीरता के उत्थान के अर्थ में;
हिंदू-मुस्लिम-मैमनस्थ के अर्थ में नहों, जैसा कि उक्त पत्रिका-संपादक का
অক্ষ जान पड़ता है। तथापि रत्नाकर जी का भुपण-युग का कवि कहना
केवल हँसी की बात है। किसी कवि के दो चार पदों के लेकर एक सिद्धांत को
स्थापना फर चलना ठीक नहीं ।
नए नए सिद्धांतों का निरूपण और आविष्कार करनेवालों में से चाहे
के उन्हें भूषणकाल का और चाहे कोई उमर खैयाम का प्रतिस्पद्धों बतलाये, ,
परंठु साहित्यिक और सामाजिक इतिदास के जानकार और रत्नाकर ॐी ~
के परिचित उन्हे इस खूप मे नदीं देखते । रत्नाकर जी के उद्धवशतक में उद्धव
के जोगतंत्र के भोषियों की भक्ति-भावना से पराजित करने ण्ठी याजना नवीन
नहीं है 1 उनकी पक्तियाँ भी अनेऊ अँशों में सुरदास, नंददास आदि कौरउक्तियो
से मिलती-जुलती हैं, थ्द्यपि उनमे रत्नाकर जी की एक निजता अवश्य है।
অহ और निगगुण भक्ति की यह रसमयी रागिनी वैष्णव साहित्य को एक
सावजूनिक विशेषता है। क्ृष्णायन संग्रदाय के प्रायः सभी कवियों ने इस
रापिनी में अपना स्व॒र मिलाया है। ऐसी अवस्था सै यदि केर कहे कि रत्नाकर
जी की गोपियों की उक्तियाँ नवीन युग के व्यक्तिवाद का संदेश सुनाठी हैं अथवा
मावो अनीश्वरवाद का संत करती हैं, ते यह प्रसग के साथ अन्याय और
रत्नाकर जी को अ्रकृति से अपरिचय प्रकट करना ही द्ोगा। इससे चमत्कार
की रृष्टि भले द्वी दो, सत्य की स्थापना नही होगी 1 +
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