संघर्षकालीन नेताओं की जीवनिया | Shgrhkalian Netao Kee Jivaniya

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Shgrhkalian Netao Kee Jivaniya  by सैयद अतहर अब्बास रिज़वी - Saiyad Athar Abbas Rizvi

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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हर चै धूपन्त श्रीमन्त नाना धु, शासकीय अनुमान से पेशवा की जागीर तथा सम्पत्ति १६ लाख रुपये की थी, जिससे ८०,००० २० वाधषिक आय थी । हीरे, जवाहरात রা आयुष इनके अतिरिक्त थे, जिनका मूल्य लगभग १३ लाख था। इस स्थिति को देखकर स्थानापन्न कमिश्नर धिर ने शासन को संस्तुति दी कि श्रीमन्त नाना ध वृषन्त को बाजीराव पेशवा की ८ लाख वापि पेन्शन का कुच भाग झ्वश्य दिया जावे, जिससे आश्रित परिवारों का भरण-पोषण होता रहे, यह धन-राशि धीरे-धीरे भत्ते हो कम कर दी जाय | परन्तु प्रातीय गवर्नर ने इसके विरद ्रपनी सस्ति दी ।! उसके विचार से सचित धन-सम्पात्त पेशवा-परिवार तथा आश्रितों के लिए पर्याप्त थी । नाना साहब द्वारा अतिथि सत्कार ; इतना सब होने पर भी भ्रीमन्त नाना धघुधूपन्त ने अपने रहन-सहन तथा आवचार-व्यवहार में कोई परिवतेन नहीं क्रिया । कानपुर में स्थित तथा आनेवाज्ञे अग्रेज पदाधिकारियों को अथवा आगमस्तुकों को नाना साहब बढ़े आदर-सत्कार से बिठ्र में आमन्त्रित करते थे । एक समकालीन सवाददाता लिखता है--“में नाना साहब को भक्ती- भांति जानता था! उनको उत्तरी प्रान्तों में सर्वोत्तम और उच्चकोटि का सत्कारकर्त्ता भारतीय नागरिक समभता था। अमानुषिक श्रत्याचार करने का विचार उनका कभी भी नहीं हो सकता था! नाना साहब को अरजो से मिलने पर राजनीति की बाते करने का बड़ा उत्साह था।” उपय्यक्ष संवाद- दाता पुन लिखता है कि -- मै সন मुझसे कई प्रश्न किये, उनसे से घे याद्‌ &-- তা डलहोजी क्या ्रवध के नवाब से मिलना पसन्द नहीं करेंगे ! বান্ত हाटिज ने तो ऐसा अवश्य किया था। २--क्या आप सोचते हैं कि कनल स्लीमैन, ज्ञाड इलहौजी के দির हब्पने के लिए राजी कर लेगा ? वह गवनर जनरल के शिविर में इस आशय से गया अवश्य है|” ३ आरा नैरेंटिव-अग्रेल, २-सई तथा অন, १८९१ ० पैरा-१४५ । परिशिष्ट ९, नाना साहव द्वारा २६ दिसम्बर १८५२ ई० का कम्पनी क ध न के सचालकों के नाम ग्राथना-पत्र तथा उनका {निशं ॥ व नका उस पर निर्णय | २, चाल्सं वाल हिस्टरी आव दि इंडियन म्यूदिनी सन्‌ १८५१ ६० की घटना का वर्णन । पू ४० ३०४,




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