तुगलुक कालीन भारत २ | Tugluk Kaleen Bharat Bhag 2

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Tugluk Kaleen Bharat Bhag 2 by सैयद अतहर अब्बास रिज़वी - Saiyad Athar Abbas Rizvi

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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( ब ) भारतवर्ष के मुसलमानों के इस्लाम के मार्ग से विचलित हो जाने के कारण तथा भारतवर्ष में इस्लाम की शोचनीय दशा की वजह से উদ ने भारतवर्ष पर श्राक्रमणं किया किन्तुं उसी के इतिहास द्वारा यह स्पष्ठ हो जाता है कि इस कथित इस्लाम के योद्धा का मुकाबला बहुत से स्थानों पर हिन्दुओं तथा मुसलमानों ने संगठित होकर कियां और वे तैमूर के आ्राक्रमण को भारतवर्ष पर एक विदेशी का आक्रमण समझते थे। शरफ़ुद्दीन अली यज़दी की जो भी व्याख्या हो पर तैमूर स्वयं यह समझता था कि भारतवर्ष के सभी हिन्दू तथा मुसलमान उसके शत्र हैं। उसने अपनी संनन्‍य शक्ति द्वारा यहाँ के निवासियों का दमन किया और प्रत्येक स्थान पर जो ह॒त्याकाण्ड हुश्रा उसमें मारे जाने वालों में हिन्दू तथा मुसलमान दोनों ही समान रूप से सम्मिलित थे। इस प्रकार शरफ़्द्दीव अली यजदी के इतिहास से यह भली-भाँति स्पष्ठ हो जाता है कि मुसलमान मुग़ल आक्रमणु-कारियों को हिन्दुओों के साथ. मिलकर अपने देश से निकालना चाहते थे और मेरठ में उसे इस बात की चेतावनी भी दी गई कि यह वही स्थान है जहाँ तुर्माशीरीं को भी विजय न प्राप्त हो सकी थी। शरफुद्दीन अली यञदी के इतिहास ने इस बात को सिद्ध कर दिया है कि मुसलमान अपने राज्य के २०० वर्ष के भीतर ही भारतीय राष्ट्र का एक मुख्य अंग बन गये थे और यहाँ की जनता हिन्दुस्तानी थी और सभी एक साथ मरने और मारने के लिये कटिबद्ध थे । सुल्तान फ़ोरोज्ञ शाह फ़तृहाते फ़ोरोज़शाही तबक़ाते अकबरी में सुल्तान फ़ीरोज़ शाह की इस रचना का उल्लेख हुआ है । तबक़ाते अकबरी का लेखक निज़ामुद्दीन लिखता है कि सुल्तान ने अपने राज्यकाल की घटनाओं को स्वयं संकलित करके फ़्तृहाते फ़ीरोज़शाही नामक पुस्तक की रचना की थी। तबक़ाते अकबरी के लेखक ने उस पुस्तक को देखा था और अपने इतिहास में सुल्तान फ़ीरोज़ शाह के राज्यकाल का विवरण देते हुए वह उस पुस्तक से लाभान्वित भी हुआ था! उसका कथन है कि सुल्तान फ़ीरोज़ शाह ने फ़ीरोजाबाद की जामा मस्जिद के तिकट एक अ्रष्टाकार गरुम्बद के आठों ओर इस पुस्तक के आठ अध्याय पत्थर पर खुदवा दिये थे* । उसने उस पुस्तक में से राजनीति, कर व्यवस्था तथा सावंजनिक निर्मास के कार्यों के सम्बन्ध में आवश्यक संक्षिप्त उद्धरण भी दिये हैं किन्तु अब इस मुम्बद का पता नहीं, न पूरी पुस्तक, ही कहीं मिलती है। अफ़ीफ़ ने भी सुल्तान की इस रचना का उल्लेख किया है | फ़्तृहाते फ़ोरोज़शाही १८८५ ई० में देहली से प्रकाशित हुई थी और इसकी दो एक हस्तलिखित प्रतियाँ भी मिलती हैं किन्तु इसमें सुल्तान फ़ीरोज़ शाहु के राज्यकाल की घटनाओं का अधिक विवरण नहीं है केवल राजनीति, अथ-व्यवस्था, शासन प्रबन्ध तथा सार्वजनिक निर्माण के कार्यों का संक्षिप्त उल्लेख मिलता है। इसमें फीरोज़ शाह ने अपने कारनामों का जो विवरण दिया है उससे पता चलता है कि वह॒धर्मनिष्ठ सुन्नी मुसलमान के रूप में जीवन व्यतीत करने तथा शासन प्रबन्ध को भी उसी ढाँचे में ढालने का प्रगगत्त करता था। हिन्दू. मुसलमान तथा इस्लाम के त्रन्य फ़िरकों से उसे कोई सहानुभूति नथी। चरा के विरुद्ध बहुत सी बातों को जो हिन्दुओं के प्रभाव तथा दोनों जातियों के घनिष्ठ सम्बन्ध के कारण স্টিল শি পিপি ००१० ও পা ~~~ क न्न ~ तवक्राते अकेतेर माय १ पृ० २३६ ।




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