सारा संसार | Saara Sansar

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Saara Sansar by आरिग पूडि - Aarig Pudi

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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५ नियम हो । उनके दूसरे लड़के आ रहे थे । मोहन राव । हाथ में थैली, दिन-भर का नकद रुपया । पास वाली मेज पर थे थैली स्ख कर वापस मुड़े ही थे कि उतके पिता ने पूछा, “रामू आया है कि नहीं ? “नीचे तो नहीं दिखाई दिया, ऊपर भी नहीं है ।”” ८ दु, मोहन राव ने फिर जाना चाहा जैसे वहाँ खड़ा रहना उसके लिए- ' कठिन हो रहा हो, लेकिन इतने में पिता बोल उठे, “उससे बातचीत की थी, समझाया था ? ” “जी नहीं, वह मिला नहीं, सोचा था कि श्रव बातचीत कर लूगा, फिर खयाल आया कि उससे बातचीत आप ही कर लें तो श्रच्छा टोगा 1 /हूं, और क्या सोचा था ?” श्री बापिराजु की नजर जूरा उठी श्ौर मोहन राव की नज़र नीचे हो गई । इस बार उन्होंने जाने का प्रयत्न किया । “कहीं यह भी तो किसी लड़की से प्रेम नहीं कर रहा है ? प्रेम परेम “'” श्री वापिराजु ने परिहास में मुसकराना चाहा, होंठ चपटाये भी, पर श्राँखे उनकी उद्विस्तता से उभर-सी रही थीं । “प्रेम लिये बढ़ी कीमत देनी होती है ˆ“ पागलपन है, विना भाव पढाये वेपरखा माल खरीदना है, रोक रहा था, कट्‌ दिया, वरना इसके कहने की जरूरत न थी, हाँ, जब वह मिले तो समभाचुझा कर कहना कि जो सम्बन्ध हमने तय किया है वह हर तरह से श्रच्छा है, फ़ायदेमन्द है और मुझे पसन्द है, समभे 1 श्री मोहन राव सुनकर नीचे चले गये । उनकी उम्र तीस-वत्तीस की होगी 1 तीन बच्चे थे । कारोबार में हिस्सा या, श्रलग घार ने या




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