गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र | Geetarahsya Athva Karmyogshastra

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लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
33 MB
कुल पष्ठ :
894
श्रेणी :
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)भस्तावना ৭৩
नहीं है--वह हिन्दुओं के लिये एकदम नई वस्तु नहीं है कि जिसे उन्होंने कमी
देखा-सुना न हो । ऐसे वहुतेरे लोग हे, जो नित्य नियम से भगवद्गीता का पाठ किया
करते हैं,और ऐसे पुरुष भी थोद़े नहीं हैं कि जिन्होंने इसका शात्रीयदट्या अध्ययन किया
है अथवा करेंगे। ऐसे अधिकारी पुछ्पों से हमारी एक प्रार्थना है कि जब उनके
हाथ में यह प्रन्थ पहुँचे और यदि उन्हें इस प्रकार के फुछ दोष मिर जाये, तो दे
कृश कर दमे उनकी सूचना दे दें । रेशा दने से हम उनका बिचार करेगे, ओर
यदि द्विताय संस्करण के प्रकाशित. करने का अवधर आया तो उसमें यथायोग्य
संशोधन कर दिया जावेगा । सम्भव है, कुछ छोग समझें कि, हमारा फोई विशेष
सम््रदाय है और उसी सम्प्रदाय की सिद्धि के व्यि हम गीता का, एक प्रकार का,
विशेष अर्यं कर रहे हैं. । इसलिये यदों इतना कह देना आवश्यक दहै कि, यह
गीतारह॒त्य भन्य किसी भी व्यक्तिविशप अथवा सम्प्रदाय के उद्देश से लिखा नहीं
गया है । हमारी बुद्धि के अनुसार गांता के मूल संस्कृत श्होक का जो सरल अर
होता है, वही हमने लिखा है। ऐसा सर॒रू अथ कर देने से---और आज कल
संस्कृत फा बहुत कुछ प्रचार हो जाने के कारण, चहुतेरे छोग समझ सकेंगे फि
अर्थ सरल है या नहों--यदि इसमें कुछ सम्प्रदाय की गन आ जावे, तो बह गीता
का है, हमारा नहीं | अर्जुन ने भगवान से कद्दा था कि “' मुझे दो-चार সাম बतला
कर उल्सन में न डालिये, निश्वयपूथक ऐसा एक ही मार्ग बतलाइये कि জী श्रेयस्कर
हो” (गी. ३. २;५.१); इससे प्रकट ही है कि गौता में किसी न किसी एफ दी विशेष
मत का श्रतिपादन होना चाहिये । मूल गौता का ही अये करके, निराग्रह बुद्धि से
हमें देखना है कि बह एक हो विशेष सत कोन सा है; हमें पहले हो से कोई मत
स्थिर करके गीता के अगर की इसलिये खांचातानी नहीं करनी हे, कि इस पहले से ही
निधित क्षिय हुए मत से गीता का भेल नहीं. मिलता । सारांश, गौता के वास्तविक
रहस्य का,--फ़िर चाहे वह रदस्य किसी भी सम्रदाय का अथवा पन्थ कां दो--
गीता-भक्तौ मे प्रसार कर, भगवान् के ही कथनाद्ुसार यह ज्ञानयज्ञ करने के लिये
हम परत हए द । हे आशा है कि द ज्ञानयज्ञ की अब्यंगता की सिद्धि के लिये,
उपर जो ज्ञानभिक्षा माँगी गई है, उसे हमारे देशावन्धु और ध्वन्धु নই আনব
से देंगे।प्राचीन टीकाकारों ने गीता का जो तात्पय निकाला है उसमें, और हमारे
भतानुसार गीता का जो रहस्य है उसे, मेद् वयो पडता हे १ इस मेद कै कारण
गांतारहस्थ में पिस्तारपूर्वक बतलाये गये हैं. । परन्तु गौता के तास्य-सम्बन्ध भे
यद्यप्रि इस प्रकार सत॒भेर हुआ करे तो भो गीता पर जो अंनेक साष्य और टकाखु,
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