जैन तर्कशास्त्र में अनुमान - विचार ऐतिहासिक एवं समीक्षात्मक अध्ययन | Jain Tark Shastra Men Anuman - Vichar Etihasik Evm Samikshatmak Adhyayan

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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३० : खैस शकहास्त्रमें भनुमान-विचारउपसंहारमें जैन अनुमानकी कतिपय उपलब्धियोंका निर्देश है जो जैन ताकि- कोके स्वतन्त्र चिन्तनका फल कही जा सकती हैं ।ऊपर कहा गया है कि यह शोघ-प्रबन्ध माननीय डा. नन्‍्दकिशोर देवराज एम. ए., डी. फिल., डी. लिट्‌., अध्यक्ष दर्शन-विभाग तथा निर्देशक उच्चानु- शीरम दर्शान-संस्थान और डीन आर्टस फैकल्टी काशी हिन्दु विष्वविद्यालयके मिर्दे- दानमें तैयार किया। डा. देवराजसे समय-समयपर बहुमूल्य निर्देशत और मार्यदर्दान प्राप्त हुआ । सम्प्रति उन्होंने प्रावकथन भी लिख देनेकी कृपा फी है । इसके लिए मैं उनका बहुत आभारी हूँ ।सुहृद्दर श. नेमिचन्दर शास्त्री एम. ए ( संस्कृत, प्राकृत, हिन्दी ), पी-एच. डो., डी. लिट्‌., ज्योतिषाचार्य, अध्यक्ष प्राकृत-संस्कृत विभाग जैन कालेज आराको नहीं भूल सकता, जिन्होंने निरन्तर प्रेरणा, परामर्श और प्रवर्सन तो किया ही है अपना पुरोवाक्‌ भी लिखा है । वे मुझे भग्नज मानते है, पर विशिष्ट और बहुमुखी मेधाकी अपेक्षा मैं उन्हें ज्ञानाग्रजके रूपमें देखता व मानता हूँ । अतएवं मैं उन्हे धन्यवाद दूं तो उचित ही है ।जिन साहित्य-तपस्वी श्रद्धेय आ० जुगलकिशोर मुख्तारने सत्तर वर्ष तक सिर- न्तर साहित्य-साधना और समाज-सेवा की तथा साधना और सेवाका कभी प्रतिदान या पुरस्कार नहीं चाहा, आज उनका अभाव अखर रहा है । आशा है इस प्रबन्ध- कृतिसे, जिसे मेने उनके €२ वें जन्मदिनपर उन्हें एक मुद्रित फर्मा द्वारा समपंण किया था और जिसका प्रकाशन उनकी सदिच्छानुसार उन्हीके ट्रस्टसे हो रहा है, उनकी उस सदिष्छाकी अवश्य पूर्णता होगी । मेरा उन्हे परोक्ष नमन है ।स्याद्राद महाविद्यालय वाराणीके अकलंक सरस्वतीभवनसे शतश, ग्रन्योका उपयोग किया और जिन्हे अधिक काल तक अपने पास रखा । काशी हिन्दू विश्व- विद्यालयके गायकबाड़ ग्रन्धागार, जैन सिद्धान्त भवन आरा और पाश्व॑ताथ जैन विद्याश्षम वाराणसीसे भी कुछ ग्रन्य प्राप्त हुए। हमारे कालेजके सहयोगी प्राघ्या- पक मित्रवर डा गजानन मुशछगावकरने मोमासादर्शनके और श्री मूलक्षंकर व्यासने वेदान्तके दुम ग्रन्थ देकर सहायता की । अनेक भ्रन्थकारों और प्रन्य- सम्पादकोंके ग्रन्थोंसे उद्धरण लिए । प्रिय धर्मचन्त्र जैन एम, ए. ने विषय-सूची ओर परिशिष्ट बनाये । इन सबका हृदयसे धन्यवाद करता हूँ। साथ ही अपनी गृहिणी सौ° चमेरीबाई “हिन्दीरत्न' को मी उसकी सतत प्रेरणा, सहायता, परिषर्या भौर अनुरूप सुविधा प्रदानके लिए धन्यवाद है ।शम्तमे महावीर प्रेसके संचालक श्री बआबुराकजी फांगुल्लको भी धन्यवाद दिये बिना नहीं रह सकता, जिन्होंने प्रन्धंका सुन्दर मुद्रण किया और मुद्रण- सम्बन्धी परामर्श दिये । “दरबाशील्ाक़ कोठिया




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