केनोपनिषद | Kenopanishad

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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खंण्ड १ ]शाडरसाप्याथ्थ ७.पदु-माष्यनिर्चेदमायान्नास्त्यङतः कृतेन । - तडिज्ञानाथ स गरुमेवाभिगच्छेत्‌ समित्पाणिः भोत्रियं जक्षनिष्ठम्‌ (मु०उ० १1२1 १२) इत्याद्याथवणे च ।एवं दि विरक्त प्रत्यगात्म- निदृत्ाक्ानस्य विषयं विज्ञानं श्रोतु [৬ मन्तुं विज्ञातुं चनमू सामथ्यशुपपचते, नान्यथा 1 एतस्माच प्रत्यगारम्‌-लोकोकी परीक्षा कर वैराग्यको प्राप्त हो जाय, क्योकि कृत (कर्म) के द्वारा अकृत ( नित्यखरूप मोक्ष ) प्राप्त नही हो सकता। उसका विशेष ज्ञान ग्राप्त करनेके लिये तो उस ( जिज्ञा ) को हाथमे समिधा टेकर्‌ श्रोत्रिय ओर ब्रह्मनिष्ठ युस्के ही पास जाना चाहिये” इत्यादि ।केवर इस प्रकारसे ही विरक्त पुरुपको प्रत्यगात्मविपयक्र विज्ञानके श्रवण, मनन ओर्‌ साक्षात्कारकीक्षमता हो सकती है, और किसी तरह नही । इस प्रत्यगात्माके' बाक्य-भ्राष्य९.भवन्ति तन्निवेतेकाश्रयप्राण-सस्कारके ही कारण होते है। “देवयाजीविज्ञानसहिितानि । “देबयाजी | श्रेष्ठ है या आत्मयाजी” इस प्रकारश्रेयानात्मयाजी बा” इत्युपक्र- स्यात्मयाजी तु करोति “इदूं मेडनेनाहुं संस्क्रियते इति'? संस्फा- रा्थमेव कर्माणीति वाजखनेयक्े। “महायज्ञे यज्ञेश्च च्ाह्मीय॑ क्रियते तनुः (मन्नु० २। २८) “यज्ञो दानं तपश्च पावनानि मनीषिणाम्‌” (गीता १८ । ५) इत्यादि स्मुतेश्च 1प्राणादिविज्ञानं च केव कर्मआरम्म करके वाजसनेय श्रुतिमे कहा है कि आत्मयाजी अपने सत्कारे लिये ही यह समझकर कर्म करता है कि “इससे मेरे इस अगका सस्कार होगा ?? | “यह दरीर महायज्ञ और यज्ञोद्वारा ब्रह्मज्नानकी ग्राप्तिके योग्य किया जाता है।”? “यज्ञ, दान और तप- ये विद्धानोको पवित्र करनेवाले ही है”” इत्यादि स्मृतियोसे मी यही बात सिद्ध होती है 1अकेला या कर्मके साथ मिका हुआससुतं चा सकामस्य प्राणात्म- | होनेपर भी प्राणादि विज्ञान सकाम




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