हिमालय के यायावर | Himalaya Ke Yayavar

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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3, स्थानास्तरित क्रपक-समाज 4. स्थायी कृपक-समाज खाद्य संग्रहीता : इस व्यवस्था में पर्याप्त परिश्रम की आवश्यकता रहती है । जंगली पदार्थ, कन्दमूल, फल तथा पत्ते इकट्ठा करना आसान काम नही है । ये लोग शिकारऔर मछली पकड कर भी जीवनयापन करते है । छोटा नागपुर के विरहोर, उड़ीसा के ज्वांग, मध्यप्रदेश के कोरबा, केरल के कादर तथा महाराष्ट्र के कतकारी भ्रादिवासी इसी प्रकार की जीवनयापन पद्धति अपनाए हुए हूँ । कुछ लोग खानावदोश हैँ । ज्वांग जनजाति तो सांप तक खा जाती है । को रवा कच्चा मास खाने के शौकीन हूँ । “हो” जनजाति के बच्चों को शुरू से ही सिखाया जाता है. कि वे शिकार करके ही भ्रपना हिस्सा प्राप्त करने का प्रयत्न करें। इस शिकार के पीछे कितनी जानें जाती हूँ इसका अनुमान लगाना कठिन है। चरवाहें आदिवासी * हिमालय तथा विश्ध्याचल की अ्रनेक जनजातियां पशुपालन द्वारा जीवनयापन करती हं । हिमालय की घाटियी में चरवाहों की बंशी जब पर्वतत की गूज बनती है तो लगता है उनके कठिन जीवन में माधूयं घुलता झा रहा है। यहा के गद्दी, भोदिया, किन्नर आदि भेड़-बकरी पालतें हूँ। इनमें से बहुत से लोग यायावरी जीवन व्यतीत करते हैँ । उन्हें महीनो नहाने का अवसर भी नहीं मिलता, प्रकृति का सान्निध्य ही उन्हें स्वस्थ रखता है । इनकी समस्याएं भी अनेक है। भोटिया लोग ऊन तथा बस्त्रों का व्यापार करते हूं चीनी ग्राक्रमण से पूर्व इनकी श्राथिक स्थिति श्रच्छी थी, ये चीन से ऊन आदि का व्यापार करते थे। नीलगिरि के टोडा लोग शुद्ध शाकाहारी हैं । वे गाय-भेंस पालकर अपना निर्वाह करते हैं। इन लोगो की जनसंख्या वहुपति प्रथा के कारण घटती जा रही थी; पर आजकल यह प्रथा लगभग समाप्त हो गई है ग्रतः संख्या भी बढती जा रही है । गुज्जर तो पूर्णतः यायावर समाजं ट । यहा यह बात स्पष्ट कर देता उचित होगा कि ये जनजातिया मुख्य रूप से पशुझों के सहारे ही गूजर-बसर करती हूँ । श्रतः चरागाहो के भ्रभाव में उन्हें अपना घरवार छोड़कर ग्रन्यज्ञ जाना पडता है । उनका सारा परिवार भी साथ रहता है। ऐसी स्थिति में न तो उनके बच्चे नियमित रूप से शिक्षा प्राप्त कर सकते है और म ही उनके परिवार सुख-शान्ति का जीवन व्यतीत कर सकते हूँ । हिमाचल प्रदेश के पागी क्षेत्न में पंगपवाल लोग पशुपालन करते हैँ, लेकिन छः: माह से भी श्रधिक समय तक वहा बर्फ जमी रहती है। अतः ऐसी दशा में केवल दो ही विकल्प रह जाते हूँ । वे या तो अपना घरवार छोड़ कर दूर कहीं दूसरे प्रदेश में निकल जाएं अथवा रात-दिन लग कर इतना चारा एकत्र कर लें कि वह पशुओं के लिए साल भर तक पर्याप्त रहे | कैसी विडम्बना है आदिवासी जीवन की । माधीजी कहा करते थे, “भारत गांवों का देश है और गाव खेती पर ग्राधारित है । भ्रतः यदि गाव प्रगति करते हैँ तो सारा देश उन्नति की ओर ग्ग्रसर होता है ।” यह बात ग्रादिवासी समाज पर भी लागू होती है । जन-जातिया चाहे पशुपालक हो या खाद्य-सग्रहीता, एक स्थिति एसी श्राती है জন उन्हें कृपि का सहारा लेना ही पड़ता है | श्रनेक पशुपालक समाज क्रधि-कार्य भी करतें है ! प्रमूख कृषक जनजातिया हँ--संथाल, उराव, मुण्डा, भील, गोंड, मझवार, खस, हो, कोरबा, गारों तथा खासी आदि 1 पहले कभी बिना ভল-বঁল के ही कृषि हो जाती थी, किन्तु अरब यह अपवाद होता जा रहा है। जनजातीय कृषि व्यवस्था का मुख्य रूप है-स्थानान्तरित कृषि | इसे झूम की खेती भी कहते है ! कभी मानव कन्द-मूल खा कर तथा जंगली जानवरों के शिकार पर जीवनयापन करता था। कृषि व्यवस्था का जन्म आज से लगभग दस हजार वर्ष पूर्व नियोलिथिक काल में हुआ । विश्व के उष्ण तथा कुछ कम उष्ण प्रदेशों की जनजातियो में प्राय. सर्वत्र स्थानास्तरण कृषि की जाती है । असम की कुछ जातियो, जैसे भील, कोरकूज श्रादि में झूम की खेती झ्राज भी आशिक रूप में विद्यमान है। पहले लोग दुल्हाड़ी से जंग्रलों को काट देते है।फिर आदिवसो भारत न




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