हिमालय के उस पार | Himalaya Ke Us Par

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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साहब के चपरासी को ही सुना रहा था। लेकिन उसकी इस वाणी से न तो साहब के चपरासी को तकलीफ हुई, न किसी आय কী) आखिर वह नेता बडबडाट करता हुआ, उस होटल मं यहुवा, जो कि दफ्तरके मिकट ही था। नेता जब वहा पहुचा तो ख ना साहब को भी समय का स्याल आया । चर्चा वीच हीमे छोड, नेताजौ की आर अभिमुख होकर बोजे--“5ष्डा पियेंगे या गम ?” नेताजी ने उत्तर दिया--“मैं ्रष्टा- आरियो की ऊपर की कमाई भे से कुछ खा-पीकर पाप का भागी नहीं अननः चाहता । मुझे कुछ नही चाहिए ।”” “आप तो नाराज हौ रहै हँ 1 खन्ना साहव ने कहा--“आपका काम तैयार हुआ पडा है । पहले आप कुछ पी लीजिए। फिर अपन दफ्तर चलते हैं। आपके कागज मैं अभी आपके हवाले करता हू।” “ऐसी ही इच्छा है ता एक गिलास केवडा शवत मगवा लीजिए।” नेताजी ने मुस्कराते हुए कहा । अब तक उनका क्रोध शाप्त हो गया था। नेताजी जब दबत पी चुके तो खना साहब भी उठ खडे हुए। काउटर के पास आकर नेताजी ने चोले की जेब मे हाथ डाला तो खाना साहब कहने लगे--“आप क्या करते हैं? बिल चुकाने को यहा आवश्यकता नहीं। इस होटल मे मेरी उधार चलती है। हर महीने की पहली तारीख को हिसाब होता है ।” खना साहब का इतना कहना हुआ ओर नेताजी ने अपनी बद मुट्ठी जेव से निकाल ली। उनकी जेब मे उस समय कुछ था भी नही । भघे को चाहिए दो आखें, ओर नेताजी को तब आवश्यकता थी, खना साहब के ऐसे ही शब्दों की । वे दोना। घाहर की दुकान पर, जो इसी होटल के मालिक की थी, पान खाकर दफ्तर मे चले गये । यक्ष के नीचे बैठे लोग, जिनमे राजू भी था, साहब को देखकर, सम्मानं प्रकट करन के लिए एक बार खड़े हुए और साहब जब वफ़्तर से प्रवेश कर गए तो वे पुन बठ गए। साहब नेताजी से घुल-मिलकर बातें कर रहें थे, उह्दोन उस भीड को बेंठे अथवा खडे होते नहीं देखा! साहब ओर नेताजी ने जब दफ्तर मे प्रवेश किया तो नेताजी ने मुडकर उस लडकी की ओर देखा तथा एक आश् भीचकर, उसको भीतर भाने का सकेत किया । नेताजी के पीछे पीछे वह लडकी भी उस दफ्तर में घुस गई। हिमालय के उस पार / 15




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