राजस्थानी व्रतकथाएँ | Rajasthani Vratkathae

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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२१ षली-- श्री प्रपरचन्द नाइटा मःजिनप धाबर २६ জিলঙ্ণ নাবী भी प्रगरबम्द्‌ बाह्य २७ राजस्वातौ इल्तधिद्ित प्रणो का विवरण २८ दम्पति भिनौर [ २६. ह्वीपाशी-राजस्थात का बुद्धिवर्षक क्षाहित्प ३० छमजयुर्दर रात्रय সী ঘধলোল লাছত ३१ बुरहा पाद्य प्र॑भागली शमी भदरीम्र्टार सार्क्परिया वैरलमेर रेविष्टकिक सबन तदह (वपा य दरारषं शर्मा) ইহাতে प्रणाली (संद्र अररीप्रसाद धाकरिपा) मर्यो (সী पोबदते शर्मा} पएमस्मानी बैन सहित (ले भी धमरभन्द मधय) भागवमण (संपा अदरीप्रषाम्‌ यकष) मुद्यषरा कोर (मूरलोषर भ्यास) धादि पलो का पपन हो झुका परु पर्मानिब क নৃত্যে इसका प्रकपशन इस भर्प हो हो জো ই) इप घारा करते हैं कि कार्य कौ महत्ता एवं पु्ता को खह्प मैं रखने हुए प्रषलै वर्ष इससे भी प्रविक सहायता इतें प्रबरव धाप्त हो छरहेमी -गिधसे उपशेक्त दपारित ठवा प्रत्व महत्वपूर्श प्रंदों का प्रकाशत शंम्मव हो धरैया । इस शह्ापता के लिये हम मारत सरख्यर के रिष्मचिष्रात सविषालय के प्राजारी हैं. जिसने हएा १एढ़े हमारी मोजता भो स्वी रिमा मौए प्राष्ट-इत एड की एक्स संजूर की । राजस्थान के मुस्प मत्त्री मातनीय सौन्‍हवनशालदी धुखाहिया जो शौजाभ्प से शद्ध मत्त्री भी हैं सौर जो ग्राहित्व दी प्रयति एवं पुनश्यार के নিত দু পরখ हैं. था भी इस सट्मायता के प्राप्त कराने मैं यृणयूण थोयत रहा है। प्रणा हम इतने पथि धपती हवलया घादर प्रगट क्से §। शाजस्वात के प्रादसिक धौर जाष्यमिक शिक्षप्पष्ठ पह्तेएव भी जयप्रावसिदजी पैल्ला का जौ इस प्राशर प्रपट करते हैं, जिरहोंने प्ररभो पोर ले पूरी-प्‌री दिवअस्पी मैबर हमारा छत्हाइबद ते शिष्य जिलसे हम इस बहर्‌ कार्य वो सम्पप्त करते में इतयं हो इङ शर्वा उनो दरव णी पष)




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