पंचपात्र | Panchpatra

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Panchpatra by मामा वरेरकर - Mama Varerakarरामचंद्र रघुनाथ - Ramchandra Raghunath

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मामा वरेरकर - Mama Varerakar

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रामचंद्र रघुनाथ - Ramchandra Raghunath

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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हैसन्त कृष्णु : केदार ` ऊँष्णु ' हेमन्त ` केष्ण : हेमन्त पुनश्च गोङ्कुलम्‌ नष न्‌ : इधर आकर बैठ जाओ न रन्त ्वंतक खड़े रहोगे १ अच्छा, अच्छा | (बैठते है ।) इसी तरह बैठता था में अपने साथियों के साथ | तुम्हारे जेसे ही थे वै--बडे स्नेही, वडे श्रद्धालु अर बडे संशयालु--तुम्हारे सराखे--परन्तु तुम्हारे समान बडे नहीं थे | हम सब बालक-ही-बालक थे | बडा मजा लुटते थे | उस वक्त हमने खूब चोरिया की--दूध, दही और माखन की बडी नटखट थी उस वक्त की ग्वालनें और आज की क्या कम हैं? वे भी नटखट ही हैं। पर अब हम चोरी-वोरी नहीं करते | (गहरी सास भरकर) गये वे दिन ! तुम क्या चोरियों' करोगे ? नामद हो गई है आज की पीढ़ी | उस वक्त सारे वाले ओर गालिनें हम बालकों से थर-थर कोते थे | खुशी से हमें दूध, दही अर माखन देते थे | पर चोरी के माल में जो मजा है उसका क्या कहना ? वाह ! (आँख मूँदकर धीरे से हँसते हैं ।) (अपने दोनो साथियो से) देखो-देखो | केसी आँखें मूदकर वैठे है जेते चोर-विलाव हो | मेरा ख्याल ই कि आज भी यह चोरी करने से बाज न आयेंगे | (फिर एक गहरी सास छोडकर आँखे खोलते है।) गए वे दिन और उन चोरियों का आनन्द भी चला गया । कोन जाने, शायद वै वालिनं मी चली गह हो! कोन-कोन थीं वे ?




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