उपनिषदों के चौदह रत्न | Upnishdo Ke Chowdh Ratna

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Book Image : उपनिषदों के चौदह रत्न  - Upnishdo Ke Chowdh Ratna

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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अनोखा अतिथि ७9 पूर्णाहति होनेपर परम श्रद्धासे ऋत्विकृगणको दक्षिणा बॉदते है । आकांक्षारहित होकर सात्तिक यज्ञकर्ता वेदविधिका पूर्णतया पालन करते हुए समस्त कार्य सम्पादन करते है । ऐसे पवित्र युगमें ऋषि वाजश्रवाके सुपरत्र उद्दालक मुनिने विश्वजित्‌ नामका एक यज्ञ किया । इस यज्ञमे सबेख दान करना पडता है| तदलुसार वाज- श्रवस॒ ( वाजश्रवाके पुत्र ) उद्दालकने मी 'सर्ववेद्स दुदौ'---अपना सारा धन पियको दे दिया । पि उदाट्कके नचिकेता नामक एक पुत्र था | जिस समय छि छविज ओर सदस्योको दक्षिणा बाँट रहे थे और उसमे अच्छी-बुरी समी तरहकी गोएँ दी जा रही थी उस समय बालक नचिकेताके निर्मल अन्तःकरणमे श्रद्धाने प्रवेश किया । नचिकेताने अपने मनमे सोचा--- पीतोदका जग्धत्तणा दुग्यदोहा निरिन्द्रियाः 1 अनन्दा नाम ते छोकास्तान्‌ स गच्छति ता ददत्‌॥ (कठ० १।१। ३) “जो गौएँ ( अन्तिम बार ) जल पी चुकी है, घास खा चुकी है ओर दूध दुह्ा चुकी है; जो शक्तिहीन अर्थात्‌ गर्भ धारण करनेमे असमर्थ है, ऐसी गायोकों जो दान करता है वह उन छोकोको प्राप्त होता है जो आनन्दसे शून्य है |! यज्ञके बाद गोदान अवश्य होना चाहिये, परन्तु नहीं देने योग्य गौके दानसे दाताका उछठा अमड्रल होता है । इस प्रकारकी भावनासे सरल्हदय नचिकेताके मनमे वडी बवेदना हुई और अपना बलिदान देकर पिताका अनिष्ट निवारण करनेके लिये उसने कहा-- , तत कस्में माँ दास्यसीति।




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