स्वर्ण - विहान् | Swarna - Vihan

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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पहली झलक পাতা कहाँ बेच हम पा सकती है, धघनवैभव से दीन ? हुए भूख से तड़पन्तड़प वालक निद्रा से लीन ॥ गये पिताजी मजदूरी को उठकर प्रात काल । इधर जननि का देख रहे दो केसा आकुल हाल हम है, कृषक जगत का जिनपर रहता है आधार । अन्धकार-सा कंगाली ने े म्या वहाँ विस्तार ॥ -मोहन- दृश्य यहाँ का देख करुणतम भूले हम अभिमान । जनि कया मानस मे बरबस उठता दहै तूफान । दु




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