स्वर्ण - विहान | Swarn Vihan

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Swarn Vihan by प्रेमी - Premi

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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पहली झलक रुूुणफा- फिर भी अवतक सुख से जीता यह्‌ स्वार्थी समुदाय । इससे छुटकारा पाने हम करते क्यो न उपाय ? ये अति ऊँचे भवन मनोहर यह वैभव-सामान 1 क्यो न जला देते है इनकों सव सिल दुखी किसान ? ( फिर वेदना से कराहने लगती है ) न = ( मोहन ओर विजय का प्रवेश ) मोहन किस पीड़ित मानस की करुणा छोड रही हे आद्‌ ! किसकी सुनता हू ,इस घर में पीड़ा-भरी कराह ?




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