पट्टावली प्रबन्ध संग्रह एसी 4239 (1968) | Pattavali Pravandh Sangrah Ac 4239 (1968)

5 5/10 Ratings.
1 Review(s) अपना Review जोड़ें |
Pattavali Pravandh Sangrah Ac 4239 (1968) by नरेन्द्र भानावत - Narendra Bhanawat

लेखक के बारे में अधिक जानकारी :

No Information available about नरेन्द्र भानावत - Narendra Bhanawat

Add Infomation AboutNarendra Bhanawat

पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

(Click to expand)
(२१ 3 जते हैं। इन तीनों की पट्टावलियां मुल गुजराती लॉक। की परम्परा से मिलती हुई हैं। पर मंगौरी लोंका मच्छु जो स० १५८० के समय ही रागर झौर क्रति रूपचन्दजी से प्रकट हुआ, उसका संबन्ध गुजराती लॉक्य की पट्टावनी से नहीं मिलता । यहां पर मुख्य रूप से नागौरी लोका प्लौर ग्रुजराती लोंका के मोटी पक्ष भौर লালী पक्ष वी पट्टावलियां प्रस्तुत की गई हैं। भ्रन्य भी गद्य एवं पद्म में लोकागच्छ की पद्टावलियां प्राप्त होती हैं, पर उतका समावेश इनमें हो जाता है। सकलित ७ पद्ठावलियों का प्रन्तरंग दशन इस प्रकार हैः- (१) पहली पट्टावली पटुावलो प्रवय मे ऋषि रघनाथ ने नागौरी लोका गच्छ क्षी उस्तति से १९ बी चदी तक का सक्षिप्त इतिहास प्रस्तुत क्रिया है । रचनाकाल के € वर्ष बाद ही मुनि संतोषचन्द्र ने इसको प्रतिलिधि तैयार की | भाषा আঙ্গি- काश शुद्ध एवं सरल है। पट्टावलीकार ने २७ वे पट्टथर देवधिगणी तक का परिचय देकर २८ वै चन्द्रसूरि, २६ ये विद्याधर शालाके परम निग्रन्य संमतभद्र सूरि भौर ३० वें धमंधोष सूरि माने है। धर्मंघोष सूरि ने धारा नगरी मे पवारवंशीय महाराज जगदेव प्रौर सूरदेव को प्रतिबोध देकर जैन बनाया ।॥ श्रतः इनसे धर्मंघोष गच्छ प्रगट हुआ। धर्मघोष सूरि के बाद ३१ वें जयदेव सूरि, ३२ वें श्रो विक्रम सूरि, झादि भ्रनेकं ग्राचार्य हुए । संवत ११२३ मे ३८ वें परमानन्द सूरि हुए। इतके समय सं० ११३२ में सूरबंश की पारिवारिक स्थिति क्षोण हो चुकी थी। गुरू ने उनको नागौर जाकर बसने की सलाह दी और कहा कि नागौर मे तुम्हारा बड़ा भाग्योदय होगा। गुरू के वचन से सूरवंशीय वामदेव ने सं० १२१० की साल नागौर नें भ्राकर वास क्रिया । वहां उनकी बडी वृद्धि हुई । सं° १२२१ के वषं सघःति सतीदास के यहां स्ताणी कुल देवी का जन्म हृश्रा प्रौर सं° १२२९ में वह मोरव्यासा नामके गावमें घ्रर्तघान हो गई । सं० ११३० सूरवंशोय मोत्हा को स्वप्न में दशन देकर देवी पुतली रूप से प्रकटं हुई । मोला ने कुल देवौ का देवालय बना दिया । यही सुराणा को कुलमाता मानी जाती दहै) ४०वें पट्टधर उचितवाल सूरिसे सं० १७१ मे धर्म॑धोष उचितवाल गच्छ हृध्रा । इनके प्रतिबोध पाये हुए भ्राज प्रोस्तवाल कहे जप्ते है) ४१ वें प्रौढ सूरि से सं० १२३५ में धर्मघोष पूढवाल शाखा हुई जो प्रमी पोरवाड नामे कहो जाती है । ४३ बे नागदत्त सूरि से धर्मघोष नागौरी गच्छ प्रगट हृभ्रा । सं° १२७८ में विमल चन्द्र सूरि से दीक्षा लेकर इन्होने क्रिया उद्धार किया, शिथिलाचार का निवारण किया । सं० १२८५ के वेशाख छुद ३ को इन्होने प्राचाये पद प्राप्त किया । इन्हीं से नागौरी गच्छ की स्थापना होती है । ५६ दें पटर पर दिक्वंद सूरि हए 1 ख० १४२६




User Reviews

No Reviews | Add Yours...

Only Logged in Users Can Post Reviews, Login Now