किसानों का देश | Kishanoin Ka Desh

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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थद्यपि ऊँ च-नीच की खोखली मर्यादा के दुर्ग श्राज ढहद रहे हैं तथापि शिक्षा के झभाव मैं गाँव वाले प्रायः षुराना हो स्वप्न देख रहे हैं । गाँव बाले खाने-पीने की सभी वस्तुएँ उत्पन्न करके भी भूखे रह जाते हैं । यह भोजन भाव बेहद शर्म की वस्तु है । कुछ युग का प्रभाव है जो शोषण कर लेता है कुछ निजी श्रज्ञानता है जो किसान को जकड़े रहती है । एक किसान के पास भैंस है। वह काफी दूध देती है। उस किसान से श्राशा की जायगी कि वह मजे मैं दूघ-ती खायेगा एवम्‌ व तथा उसका परिवार सुखी श्र स्वस्थ होगा । विपरीत इसके होता यह है ।क किसान उस दूघनघी को रुपये की शकल दे देता है । स्वयं माठा पीकर सन्ताघ करता है । वह रूखा-सखाः खाता है । विठा- सिन का सददत्व वह क्‍या जाने १? ऐसे ही एक परिवार का मालिक अपने सदस्यों को सब्जी इसलिए नहीं देता कि वे अधिक भोजन कर जायेंगे वे एक प्रकार से निर्वाह करते हैं श्रथवा विनोबा के शब्दों में जो इस लिए रहे हैं कि सर नहीं जाते । उनका काम जहाँ तक भोजन बिना चल सकता है चलाते हैं । यथाशक्य भोजन मैं कृपणता करते हैं । यह एक श्रभीब-सी बात है। यह सस्य है कि किसान गरीब हैं. श्रौर उन्हें दाने के लाले पड़े रहते हैं पर यह थी असत्य नहीं कि वे इतने भूस्वे हैं कि खाने की हुनर पास नहीं उनके पास खेत हैं बेकार जमीन है | वे सब्जी उगा सकते हैं। पर ऐसा नहीं करते । भोजन मैं सब्जी के मद्दर्व को वे समझते ही नहीं हैं । बे मुख्य भोजन मैं चावल या. रोटी को रखते हैं श्र श्रमुख्य में कुछ सब्जी या दाल । कर्भी-कमी नमक मिच॑ भी काम चलाने के लिए. काफी होता है। कुछ चेत्रों में दिन मैं सत्त का प्रचार है । कितसे लोग चना-चबेना पर ही दिन काट देते हैं । कितने रस पीकर रह जाते हैं । कितने काम मैँ अपने को सुलाए-सुलाए भोजन को भी शुन्ना देते हैं। यह डे उनके भोजन का रूप श्नाज पैदा करके भी वे भूखे क्यों रह जाते हैं इसे दम झन्यत्र बतायेंगे। यह ७




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