प्रवचनसार परमागम | Pravachan Paramagam

[adinserter block="2"]
Add Infomation AboutNarendra Bhanawat
Add Infomation AboutNathuram Premi
लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
7 MB
कुल पष्ठ :
252
श्रेणी :
हमें इस पुस्तक की श्रेणी ज्ञात नहीं है |आप कमेन्ट में श्रेणी सुझा सकते हैं |
यदि इस पुस्तक की जानकारी में कोई त्रुटि है या फिर आपको इस पुस्तक से सम्बंधित कोई भी सुझाव अथवा शिकायत है तो उसे यहाँ दर्ज कर सकते हैं
लेखकों के बारे में अधिक जानकारी :
नरेन्द्र भानावत - Narendra Bhanawat
No Information available about नरेन्द्र भानावत - Narendra Bhanawat
नाथूराम प्रेमी - Nathuram Premi
No Information available about नाथूराम प्रेमी - Nathuram Premi
पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)न रत सिरिपोहिका
कवित्त ।या प्रकार गुरुपरमपरातें, मह दुतीय सिद्धान्त प्रेमान |
शुद्ध सुनयके उपदेशक इत, शाख्तर -विराजत हैं परधान ॥समयसार पंचास्तिकाय श्री, प्रवचनसार आदि सुप्रहान ।कुन्दकुन्दगुरु मूल बखान, रीका अमृतचन्द्रकृत जान् ॥ ५६ ॥कवि प्रार्थना ।तामें प्रवचनसारकी, बाचि वचनिका মন্ত্র |
उन्दरूप रचना रचों, उर॑घरि गुरुपदकजु ॥ ५७ ॥कृ परमागम अगम यह, कह मम मति भतिदीन ।शशि सपरशके हेतु जिमि, शिशु कर ऊचौ कीन ॥ ५८ ॥ |
4तिमि मम निरख सुधीरता, हँसि कहिएँ परवीन ।
काक चहत पिकं-मघुरःधुनि, मूक चहत कवि कौन ॥ ५९ ॥क चौपाई 1यह परमागम अगम वताई । मो मति अस्व स्चत कविताई ।
सो क्ल हंसि किर मति धीराः। शिरिष सुमन करि वेधत हीरा 1 ६०।दोहा ।নাত मरार चदे; जथा, मन्दिर भेह - उव ।
बालबुद्धि भवि वुन्द तिमि, करन चहत कविताव ॥ ६१ ॥पूरर सुकवि सहायते, जिनशासनकी छाॉहिं ।
हूँ यह साहस कीन हे, सुमरि सुगुरु मानमाहि ॥ ६२ ॥६जक
User Reviews
No Reviews | Add Yours...