गुणों की पिटारी | Guno Ki Pitaari

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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पहला अध्याय (३) नर शिगरफ ही अच्छा होता है, मिजाज इसका गरम और खुश्क है और कम खुराक इसकी खूनकों साफ करती है ओर अधिक खुराक दूषी विषके तुल्य है अर्थात्‌ शरीरमें फोडे और फुनसियोंकों पेदा करदेती है, बूटी या किसी पत्तीके रससे बनाई हुई शिगरफकी राख बडी गुणकारी होती है और अनेक रोगोंको दूर भी करती है और नामदंको मर्दभी बनादेती है । अ्रब पहले इसके शोधनकी विधिकों लिखते हैं पश्चात्‌ मारतेकी विधिकों लिखेंगे फिर खानेकी विधिकों लिखेंगे । शोधनेकी विधि नर शिगरफकी एक तोलेको यादो तोलेकी उली लेकरके उसको एक तागेके साथ बांधकर फिर एक हांडीमें आधा सेर गौका मूत्र डालकर उस उलीको उसके ऊपर लटका दे, परन्तु गोमूत्रसे एक अंगुल ऊचा रहे नीचे हांडीके बराबरकी आग जले, गोमत्रकी बाफ उस डलोको बराबर लगता रहें फिर दो या तीन धण्टोंके पीछे मूत्रकों फेंक दे और आधसेर गौका दूध हांडीमें डालकर फिर उसके ऊपर शिगरफकी डलीको दो अंगुल ऊंचा लटका देवे और बराबरकी श्राग नीचे जलाये जबकि श्राधा दूध सूखजावे तब शिगरफको उलीको निकालकरके दूधको फक देवे श्रौर फिर दूसरे হিল সাজ या ग्रढाई पाव या तीन पाव गौका दूध लेकर हांडीमं डालकर उसको श्रागपर चढा देवे श्रौर उस शिगरफकी उलीको उसके ऊपर लटका देवे श्रोर बराबरकी भ्रागको नीचे जलाता रहः इूधकौ बाफ बराबरही शिगरफको लगती रहे जबकि चहारमं दूध सूख जाबे तब डलीको निकाल करके रख छोड़े और दूधको सबेरे या संध्याके समय या रात्रिको भोजनसे दो घण्टे पीछे पीलेबे इसी तरह चालीस दिन बराबरही उस शिगरफको दूधपर लटका करके पहिली रीतिसे दूधूको ग्रौटा करके मीठा डाल करके नित्य पीवे वहां दूध बड़ा गुण करेगा श्रौर शिगरफ भी अतिशुद्ध होजायगा ।




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