भारत का वैधानिक एवं राष्ट्रीय विकास | Bharat Ka Vidhanik And Rashtriya Vikas

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Bharat Ka Vidhanik And Rashtriya Vikas by गुरुमुख निहाल सिंह - Gurumukh Nihal Singhसुरेश शर्मा - Suresh Sharma

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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पहला अध्याय ब्रिटेनवासियों का आगमन (१) भारत की अनन्त सम्पत्ति की कहानियों को सुनकर और स्पेनवासियों को पूर्वी द्वीप समूह के साथ व्यापार में समृद्ध होता हुआ देखकर, अंग्रेज साहसिक ललचाये और इस देश के लिए नया समुद्री मागं पाने के लिए दुस्तर खोज करने लगे। उन्होंते भयंकर कठिनाइयों और वहत वड हानियों का सामना किया । उनमें से कुछ ने इस प्रयत्न में अपने प्राणों और जहाज़ों को खो दिया ।* कुछ को विवश होकर दूसरे प्रदेशों में उतरना पड़ा और दूसरे देशवासियों के साथ व्यापा- रिक सम्बन्ध स्थापित करने पड़े 1? परन्तु वे जुटे रहे : जब तक उन्हें यह विश्वास नहीं हो गया कि भारत जाने के लिए गुडहोप' अन्तरीप से घूमकर जाना ही सर्वो- त्तम मार्ग है और जब तक उन्हें वहाँ पैर जमा सकने का निश्चय नहीं हुआ, वे बरावर प्रयत्नशील बने रहे । एक शताव्दी के दुःखद अनुभव से तो उन्हें पहली बात का विश्वास हुआ और एलिज़ावेथ के आधीन इंगलेंड की बढ़ती हुई शक्ति से उन्हें दूसरी वात की आश्या हुईं। फलत: पूर्वी द्वीप समूह के साथ व्यापार करने के उद्देश्य से, लन्दन के कुछ साहसिक व्यापारियों ने अपनी एक कम्पनी * बनाई । ठन्दन के व्यापारियों को यह कम्पनी सन्‌ १५९९ में बनी और उसे ३१ दिसम्बर १६०० में रानी एलिजुवेथ से अधिकार-पत्र मिला । उस अधिकार पत्र ने कम्पनी कौ व्यवस्था एके गवर्नर ओर चौवीस सदस्यों में निहित की और इन लोगों को पूर्वी द्वीप समूह के लिए खोजपूणं व्यापारिक यात्राओं के संगठत का अधिकार दिया। सुदूर पूर्व के व्यापार के लिए कम्पनी को एकाधिपत्य मिला और १. स्थल मार्ग में तुकिस्तान की वाधा थी और गुडहोप अन्तरीप के मागं पर ঘুর্া- गाल वालों का एकाधिपत्य समझा जाता था। २. सोलहवीं शताव्दी के आरम्भ में सर हाय विलवी ने नये समुद्री मार्ग द्वारा भारत पहुँचने के प्रयत्व में अपनी जान दी और अपना जहाज खोया । ३. कष्टेन चांसकर को विवश होकर श्वेत समुद्र (द्वाइट सी) मे जाना पड़ा । वहां से वह मास्को गये জীব आंग्ल-रूसी व्यापार ओर कम्पनी कौ नीव रखी । ४ कम्पनी का नाम था: गवरनर एण्ड कम्पनी आव्‌ मर्चेण्टूस भव्‌ कुण्डन दिग इन टु दि ईस्ट इण्डीज्‌' । ~ টি | ५ >.




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