दिव्य पुरुष नेहरु | Divya-purush Nehru

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Divya-purush Nehru by डॉ० धर्मवीर - Dr. Dharmveer

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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२ अमर ज्योति ग्ययह देवदूत जैना वेहरा ओर वह मीवी-मीठी आदते । मारयो, कते राजनीति की नजर से वच्ाभो--ब्रीस साल पहले मैने नेहरू को देखकर कहा था | मगर आज कहता हैं कि पसूड़ी ने फौलाद को काट लिया है 1” --एलदुअस हवसले जवाहरलाल नेहरू त्रिवेणी के मून्मान रुप थे | उनका जन्म प्रयाग में-- जहा परम पावन गंगा, यमुता और अतरूखो सरस्वती हैं--१४ नवम्बर, १८८६ को हुआ। १५ अगस्त, १६४७ से लेफर २७ मई, १६६४ तक वे राजधानी तीन मू्ति भवन में रहे । उसके बाद, उनको मिट्टी इस देश की मिट्टी में मिल गई । और जो ऊपर बयुलों में चली गई, बह बादलों वे साथ पानी बनकर धरती पर आ जाएंगी। बंगात बी खादी और अरब सागर भी नेहरू जी की मिट्टो से औतओतन है । और इनसे उठने दाली भाष भो उसी गरिमा से युक्त है । बरसने पर वढ़ गरिमा भी इसी घरतो पर आ आएगी। नेहरू जी का खूत-ससीना देसी घरती पर गिरेगा। भारत नेहह मय है भोर नेहर भारत मय है 1 प्रेम का प्रतिदान नहीं प्रेम के देवता जवाहरलाल ने, जिन्टोने माघो शतरा्दो तर सुन-पगोनेमे देश की सेवा वी, अपनी वसोयत मे देश के लोरो का उतरे निए असीम प्यार था, उसरा विशेष रूप से डिक्र तिया। २१ जून, १६५८ को लिखो दसोयतर मे, उन्होंते बद्ा, “भारतोद जनता से मु इतना प्रेम व स्नेह मिला है हि मैं कुछ भी क्यों ने गए इस प्रेस व स्लेह का एज बतरा भो मैं इतिदान में दे नहीं सबदा और दरअसच प्रेम झुँसी बेशकोमसती




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