वेद सिद्धान्त रहस्य | Vaid Sddhant Rahasya

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Vaid Sddhant Rahasya by स्वामी शंकरानन्द गिरि - Swami Shankarananda Giri

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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द वेद सिद्धान्त रददस्य हे आत्मा; दू रुद्र देवकी स्हुति कर, जिस देवका धनुष चाण सुन्दर है; और जो रुद्र समस्त पापोंफा नाशक है; सो ही सम्पूर्ण सुखका स्वामी है। उस रुद्रका यनन कर, और महान्‌ भोश्त आदि पुखके छिये प्रकाशित दे तथा इृवियोंसे युक्त नमस्कारोंके द्वारा उस माया प्रेरक-वल-माणदाता रुद्रका ध्यान कर ॥ इस मंत्रका सीनवार पाठ करने से अष्टाध्यायी रुद्वरीका फल मिलता है। ओम ज्यम्वकमिति मैजस्य वसिप ऋषि- रनुष्ट्प्ठन्द+ । रद्री देवता पूर्ण आयु-आादिं सुखाये विनियोगः ॥ ३० 5यवके यजामहे सुंगन्धि पुष्टिवर्धनम॥। उवारुकसिववन्धनान्सृत्यो मुंक्षीयसासृतात्‌ ।। ३» शान्तिः ३ ऋगू० ७-५९-१२ ॥ अव्याकत; सखुनात्मा, विराट इन तीनोंकी अधिष्रात देवी अमस्विका है; सोही च्यम्यका माता है । इस शक्तिका स्वामी उ्यम्यक है, और अप्नि ( ब्रह्मा) भूठोकवासी, वायु (विष्णु अन्तरिक्षासी; सूये (मददेश ) चुठोकनिवासी, इन तीन नेता रनेज ) रूप मदिमाका पिता ( पाठक ) चतुर्थ रुद्र टै, तथा जगतकी उत्पत्ति, स्वित्ति, रूय, अनुग्रह, तिरोधान, ये पौँच सुगन्विमय कीर्ति विस्ततत दै, और उपासकॉकी समस्त कामना- ऑकों पूर्ण करनेवाला, अणिमा-आदि-अैश्वय्मेव््धेक मपिता- सह बयम्वफफा हम; यज्ञ, उपासना, ज्ञानके दारा. यज़ऩ, करते,




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