संतुलन | Santulan

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Santulan by प्रभाकर माचवे - Prabhakar Maachve

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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कला-समीक्षा की कुछ समस्याएँ ३ झोर कला हैतु समभने मे लाभदायक हो सकता है। समाज और व्यक्षित, समद्र श्री० लहरो की नाई एक दूरारे मं घले-मिले है । उन्म 'अतीत्यसमृत्पाद” हुम बुद्धि से क्यो सिर्साण करें ? ग्रत सामाशिक बृत्तियो से वेयवितिक प्रवुत्तियों भिन्‍त नही की जा सकती। सामाजिक तथा वेयक्तिक जीव विक्ास--प्रोंग निम्ञस्क्ष---क्रे प्राण एक ही है, रूप-मात्र भिन्‍म है । कला के रूप और स्वछप की चर्चा श्रागे होगी हो । प्रात हमारे सप्रीक्षा-क्षेत्र भे कई भ्रान्‍्त घारशाएँ फेला हुई है। यूरोप तक में एकाज़ी और एकान्यिक सिद्रान्तो फे कारणा समीक्षा मे कंसा तिरथेक वितण्डावाद खडा हुश्रा था इसका अ्रच्वादा हमे एक वाक्प ही सकेगा | यहु वाक्य छटी भ्रन्तराः ष्टीय वर्मन-परिषव्‌ १९२६ फे सोन्दर्थ-चिज्ञान-विभाण में पछे गये सिस्ठर पाकर के एक निबन्ध के श्रन्तिमि प्रशमे हैं) घे कहते ह-- हइच्छापरिपूति श्रौर स्वयप्रेरितं ज्ञान यह्‌ दोनो एक दूसरे से विभिन्न मूल्य नही ह, कला स॒ दोनो साथ-ही-साथ रहते ह, धूरोपीय सौन्दय विज्ञानं कौ सपीक्षा-पद्धति का, जिसपे क्रोचे भी श्रा जाति ह्‌, यह प्रमुख दोष रहाह्‌ भि वहु सदा एक या दूसरे पक्ष की उपेक्षा करता रहा हैं। कोचे ने स्व॒मप्रेरित-ज्ञान के श्रागहु से भावपक्ष फो बिलक्षुल भुला दिया, तो फ्रायड शोर दूसरे सवेदसवादी भावपक्ष के विचारकों ने कोचे के मत की शोर ध्यान हो सही विधा । हमें तो श्रगर पूछा जाय कि दोनो मे तुम्हे क्या चाहिये तो प्लेटो के शब्दों मे हस बच्चों के सम्ात कहेगें--हुमें दोनों दो 7”? वास्तव में शॉपनहॉर-तीलों की जो श्रन्ध उर-स्फत्ति | ब्लाइण्ड बिल] बाली तत्त्वधारा यूरोप में चली उसी की प्रतित्रिया में नब्य श्रावशबादी, यथा वर्सा या ऋ्रोसे, खडे हुए--जसे प्रथम पक्ष हेगेल-फिरट के शतिवादी श्रध्यात्म की प्रतिक्रिया में था। कला समीक्षा को सुविधा के लिए यहं निबन्ध पाइचात्य आव्शेबादी वाशेमनिक परम्परा, मनोवेज्ञानिको की श्रोरसे श्राने वाले प्रक्षेप श्रौर सुचना, श्रौरश्रन्तमे, स्वथ कलाकार रो व॑या कहना हं इन तीन भागो सं बॉटा गया है । ङ कल{-एमीक्षा की श्राद्शेवादी दादन्कि परम्परा मे कण्ठ, हेगेल, की; मंडले, बोला के भौर जनं इयूई श्रादि प्रमुख ताम सामने आते है । कॉलिगवड के एक लेख का एक भ्रवतरण भी सदभ भे श्रायेगा । फंप्ठ के सत से रूप-सौच्दय न तो अतनुकरण सेश्रा सक्ता है, न वहु कुछ सिखाता ह न वह कोई इच्छार्पाति करता है न नैतिक सिद्यान्तर्नशीष का अनुमोदन करता हैँ । सौन्दर्य ग्रहण मे हमारा भावपक्ष एक प्रकार की लयमय क्रीडा सें शमम्ारा ही जाता हू, जो फ्रीडा किसी सिद्वान्त से परि्चिालित नहीं होती। चह तो स्वार्तः सुख्चाय होती. । यह लमभय क्रीडा, हम सत्तत चाहते है, केवल हमारी ही न रहकर




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