थेरी गाथाएं | Theree Ghathayein

[adinserter block="2"]
Add Infomation About. Dr. Bharatsingh Upadhyay
लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
4 MB
कुल पष्ठ :
136
श्रेणी :
हमें इस पुस्तक की श्रेणी ज्ञात नहीं है |आप कमेन्ट में श्रेणी सुझा सकते हैं |
यदि इस पुस्तक की जानकारी में कोई त्रुटि है या फिर आपको इस पुस्तक से सम्बंधित कोई भी सुझाव अथवा शिकायत है तो उसे यहाँ दर्ज कर सकते हैं
लेखक के बारे में अधिक जानकारी :
No Information available about डॉ. भरतसिंह उपाध्याय - Dr. Bharatsingh Upadhyay
पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)पटला चर्म डपूर्ण ! तू पूर्णता प्राप्त कर पूर्णमासी के ( पूर्ण ) चन्द्रमा की
तरह तृ कल्याणकारी धर्मा में पूणता प्राप्त कर ।
प्रद्षा की।परिपृर्ण ता से तू अन्धकार-पुंज को बिदीण कर
देगी ॥३॥
९, .तिष्या--१
उन््म-स्थान कपिलवस्तु, शाक््यकुल सें जन्म ! महाप्रजापती के
साथ प्रवज्या अहण कर अन्तर्दष्टि की लाधना सें लग गई । पूर्वोच्ध
पूर्णा की तरह दी ठिप्या ने अपने लिए अभिप्रेद संप्रहपक चुद्धन्याथा
को सुना, जिसकी पुनरावृत्ति उसने की ।
ठिप्वे ! तू तीन शिक्षाओं' को सीख | देख, बन्धन (योग)
तरा अतिक्रमण न करें !
सभी वन्धनों से दूर रहकर तू निर्मल चित्त स इस लोक मे
विचरण कर 1211
४. तिष्या--२
£ से १०. स॑स्यक मिक्ुणियों को जीवनियां प्रायः उपयु क्त ছা
के ही समान हैं। ये सब कपिलवस्तु-वासिनी शाक्य-ऊुल की महिलाएँ
थीं, जिनकी प्रवज्या महाप्रजापतों गोठमी के साथ हुईं ।
तिष्ये । तू कल्याणकारी घर्मो के सेबनन में लग। देख, तेरा
समय निकल न जाय |
जिनका समय निकल गया, उन्हें दुर्गेति में पडकर सदा शोक
ही करना पड़ता है ॥शा।
६. घीरा--१ .
धीरा! तू उम समाधि का स्पशं कर, जहां स्र चित्तवित्षेपों६. शील, समाधि झौर प्रज्ञा सम्बन्धी शिक्षाएँ |
२. चोय (बन्धन) चार हैं; काम, झव, मिध्या दृष्टि और अविया ।
User Reviews
No Reviews | Add Yours...