लघुत्रयी - मन्थन | Laghutrayi - Manthan

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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द॒ प भूरामल शास्त्री (आदार्य ज्ञानसाग्रजी) वि काव्य लघु-ऋऋयी (सुदर्शनोढदय दयोदय, ऋमुद्रद्न चरित्र) पर आयोजित आ भा विद्वद्लपोघ्ठी मे झम्मिलिठ हो बिद्वालो के बिविध-विषयाश्रित स्वमुस्योदृगीर्ण विचार झुनने फा स्वर्णिम अवसर एाप्त हुआ। उस सणोष्ठी के सप्रेशक आचार्य पू सुधासागरजी की अमृत्वाणी ने स्वर्णिम अवबक्र को झकीर भाव्यिद ऊर मनो-वैद्याक्रिफ क्रकीर्णता को झर्ब-फकाल के लिट सुदूर किया । आशत का अवश्य अहोशग्य सिद्ध होगा यदि सभी कझलता तथा फथित सकीर्ण पानिक उन्माद से भारतीय जीवन को प्रथ अष्ट न टोने दे । पारस्परिफ छदूभदनः पर्म्पराओ मे सुदीर्घन्येवी रद । इसके लिए न केवल भरुक के अण्तु सम्पूरणं विश्य के मन्य फ अच्ार्य ज्ञानसागरजी क द्वारा निर्देशित फल्य-एथ का अनुसरण करनए होग्य। मुकुन्दशरण उपाध्याय তু জে কজন सनानन धर्म प्र रू विद्यालय ब्यावर (राज)




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