संक्षिप्त पद्मावत | Sankshipt Padmavat

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Sankshipt Padmavat by श्यामसुंदर दास - Shyam Sundar Dasश्री सत्यजीवन वर्म्मा - Shree Satyjeevan Varmma

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श्यामसुंदर दास - Shyam Sundar Das

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श्री सत्यजीवन वर्म्मा - Shree Satyjeevan Varmma

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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पदमावती खंड ७ अस्बपतिक-सिर्मौर कहाबै । गजपतीक अआऑकुस-गज नावे नरपतीक कहूँ और नरिंदू | भूपतीक जग दुसर इद्‌ ऐस चकबे राजा चहूँ खंड भय होइ । सबे आइ सिर नावहिं सरवति करे न कोइ॥ ४॥ जबहि दीप नियरावा जाई । जनु कैलास नियर भा आईं बन अमराउ लाग चहूँ पासा। उठा भूमि हुत लागि अकासा तरिवर सवै मलयगिरि लाई। भदजग छोंह रैनि हौ आई मलय-समीर सोहावन दोहा । जेठ जाड लग तेहि माहं ओही छोॉह रेनि होइ आबे | हरियर सबे अकास देखें पथिक जो पहुँचे सहि के धामू। दुख बिसरे, सुख होइ बिसरामू जेइ वह দাই ভাই अनूपा। फिरि नहिं आइ सहे यह धूपा अस अमराउ सघन घन बरनि न पारों अंत । फूले फरे छवौ रितु जानहु सदा बसंत ॥ १५॥ बसहि पंखि बोलहिं बहु भाखा। करहिं हुलास देखि के साखा भोर होत बोलहि चुहचूही। बोलहि पॉडुक “एके तूही” सारों सुआ जो रहचह्‌ करहीं | कुरहिं परेवा और करबरहीं पीव-पीव” कर लाग पपीहा। तुही-तुही! कर বাকী আনা 'कुह-कुह! करि कोइलि राखा। ओ भिँगराज बोल बहु भाखा 'दही-दही' करि महरि पुकारा । हारिल विनवे आपन हारा कुहकं मोर ॒सोहावन लागा । होड कुराहर बोलहि कागा जावत पंखी जगत के भरि বউ श्रमराडं। গালি श्रापनि भाखा लेहं ददे कर नाई ॥१६॥




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