इंगलैंड का इतिहास भाग - 2 | Ingalaind Ka Itihas Bhag - 2

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Ingalaind Ka Itihas Bhag - 2 by श्री दुलारेलाल भार्गव - Shree Dularelal Bhargav

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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हिंदी-प्रेमियों से आवश्यक अपील माननीय महाशय, हमारी गंगा-पुस्तकमाल्ला को राष्रमाषा हिंदी की सफलता-एवं् सेवा करते हुए आज ६-७ वे हो चुके हैं। आप-जसे गुण-प्राहकों ने इसकी खूब ही क़द् की है। इसका ज्वलंत प्रमाण यहद डि जितने स्थायी ग्राहक इस माला के हैं, उतने आज तक किसी भी माला के नहीं हुए | इसकी ग्राहक-संख्या २,००० के ऊपर पहुँच चुकी है, तो भी अभी इसके ओर अधिक प्रचार की ज़रूरत है-- _सुचारु रूप से 'मात्ला' को चलाते रहने के लिये हमें कम-से-कम २,००० ही स्थायी ग्राइक आर चाहिए । यदि हिंदी-हितंषी, गुणज्ञ, सहृदय सजन ज़रा-सी कोशिश करं, त। उनके ज्ये गगा-पुस्तकमाला के २,००० स्थायी ग्राइक ओर जुटा देना कुछ कठिन काम नहीं। हमारी “माधुरी” के तो वे १०,००० से भी ऊपर ग्राहक बना चुके हैं । अतएवं कृपा कर$# आप स्वयं स्थायी ग्राहक बनें, ओर अपने इष्ट-मित्रों को भी आग्रह-पुर्वक बनावे । इस “अपील” के साथ छगा हुआ “आदेश-पत्र” भरकर भेज ओर भिजवाएँ । आपकी यह ज़रा-सी सहायता हमारे सभी मनोरध सिद्ध कर देगी, ओर इसके लिये हम आपके सदा कृतज्ञ रहेंगे । अस्त । हमने तो अपना कर्तभ्य पालन कर दिया । अब देखें, . इमारी इस “झावश्यक श्रपील'ः का श्रापके अपर भी कृद असर होता हे या नहीं । हम उत्सुकता के साथ आपकी सद्बायता की प्रतीक्षा कर रहे हैं। अआइए-आइए, हिंदी-माता की सेवा में हमारा हाथ बेंटाइए, ओर इस प्रकार स्वयं भी पुण्य-द्वाभ कीजिए । निवेदक --- सचालक गगा-पुस्तकमाला , लखनऊ




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