हिंदी महाभारत | Hindi Mahabharat

Hindi  Mahabharat by महावीर प्रसाद मालवीय वैद्य - Mahavir Prasad Malviya Vaidya

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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द् महाभारत श्ादिपव | चाहता कि शाप के स्वत्व पर किली तरह की हानि पहुँचे। इन बातों को सेव समझ कर जैसी ्ाज्ञ कीजिये वह मुझे स्वीकार हेगी । महात्मा देववत मछुर के कहने का तात्पय सप्भ गये ओर अपने सुख की श्रपेक्ता पिता को आनन्द पहुंचाना श्रेष्ठ जान कर अपने स्वाथ का त्याग करना मन में ठान लिया । वृद्ध चात्रियां के सामने देवचत ने हाथ उठाकर कहा--हे घीवरराज तुस्टारे मन की बात में समकऋ गया । में सब तरह से तुम्हारी इच्छा पूरी करूंगा झय का कोई कारण नहीं है । तुम्हारी कन्या से ज्ञो पुत्र होगा वही राज्य का अधिकारी होगा और मैं राज्यासव पर कदापि न बैटूँगा में जो प्रतिज्ञा करता हाँ उसके तुम शत्तरशः सत्य ही समभो । इसमें कुछ भी शन्तर नहीं पड़ सकता | यह खुन कर घीवर प्रसन्न हो कहने लगा--दे देववत संसार ज्ञानता है कि आप सत्यवादी हैं। जब आप सत्यवती के पुन्न को राज्य देने की प्रतिज्ञा करते हैं तो इस विषय में किसी को कुछ भी सन्देह नहीं हो सकता । यदि आप अनुचित न समंभ्े ओर मुझे क्षमा कर तो एक बात में श्रोर कहना चाहता हू कदाचित किसी समय आप का कोई वंशज आप की प्रतिज्ञा भंगकर उसके विपरीत श्राचरण करे तब क्या होगा ? इस के उत्तर में देवबत ने कहदा--हें घीवरराज खुनो राज्याघिकार त्याग देने का फ्ण तो हम दले ही कर चुके हैं । अब तुम्दारे दृश्य का सन्देद दूर करने के लिये दूसरी अटल प्रतिज्ञा करता हुँ किमें जावन प्यन्त अपना विवाह ही न करूँ गा जन्म ब्रह्मचारी ही रहूंगा । न रहेगा बाँस न बजेगी बाँसुरी जब मेरे कोई पुत्र ही न होगा तब तो किसी तरह की शंक्रा नहीं है । ऐसी दशा में सत्यवती के पुत्र का राज्य प्राप्त करने में काई बाधा न रहेगी । इस प्रकार देवघत ने स्वाथत्याग करके उदारता की चरम सीमा दिखा दी । राज्य तो छोड़ा ही पिता को प्रसन्न रखने के लिपे जन्म भए अपना विवाह न करने की प्रतिज्ञा भी कर डाली । उनकी इस प्रतिज्ञा को सुन कर चारों ओर से घन्य घन्य का शब्द सुनाई पड़ने लगा । देवता आकाश से फूल बरखाने ओर बड़ाई करने लगे । ऐ ली भीषण प्रतिज्ञा करने के कारण उनका नाम भीष्म पड़ा । तब से वे भीष्म कहलाने लगे । घीवर बड़ा प्रसन्न हु उसके मन की बात बिना किसी उद्योग और कठिनता के भीष्म ने पूरी कर दी । सत्यवती को उसने देवव्रत के हवाले कर दिया । उन्हों ने उसे लाकर पिता के साथ विवाह कराकर इस प्रकार पिता को निश्विन्त किया । देवघत पिता का दुग्ख दूर करने मे कृतकाय डुए इससे उन के मन में झापार आनन्द हुआ । राजा शान्तनु देववत के अनुपम कार्य पर बहुत प्रतन्न हुए श्ौर झाशीवाद दिया कि तुम्हें इच्छा करने पर स्ृत्यु प्राप्त हो । सत्यवती के गभें से चित्राजनद्‌ ओर विचिअवीये दो पुत्र उत्पन्न हुए । दोनों पुत्री के बाल्यकॉल ही में राजा शान्तजु का स्वगवाल हो गया । सत्यवती की खम्मति से भीष्स ने चित्राज्ूद को राज्य पर बिठाया । चित्राज्ञद्‌ बड़े पराक्रमी और लोक विजयी राजा हुए । एकबार एक महाबली गन्घवं से उनका युद्ध उन गया श्र उस मायावी गन्ववं ने राजा चित्राजद को संग्राम में मार डाला । राजा चित्राज्द्‌ की झन्त्येडिक्रिया करके भीष्म ने बाल ६ विचित्रवीयं को राज्यासन पर बिठाया । विधचिचयीय भीष्म को सम्मति से राज्यकायं चलाने लगें विधिज्रवीय के बड़े होने पर भीष्म ने उनके विवाह का विचार किया । उन्होंने सुना कि काशिरांज़ के तीन कन्याएं हैं वे अपना विवाह खप्रस्बर की रोति से करना चाहती हैं। माता की




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