हिंदी महाभारत भाग 4 | Hindi Mahabharat Part 4

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Hindi Mahabharat Part 4 by गणेश - Ganesh

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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झादिपवे ] एक सो पेंतालीस झध्याय पाण्ड्चों को वारखाबत नगर से भेज देने की सलाह वैशम्पायन ने कहा--सद्दाराज प्रज्ञाचलु राजा घूदराष्ट्र पुत्र की ये बातें सुनकर श्र कशिक के पूर्वोक्त नीति के उपदेश को स्मरण करकं सोच में पड़ गये। दुविधा में पड़कर वे कुछ भी निश्चय न कर सके ।. इसके बाद कणों शकुनि श्रार दुश्शासन से सलाह करके दुर्योधन ने ध्रूतरा्ट्र से कहा--झाप किसी ह्िकमत से देशनिकाले के तार पर पाण्डवों को यहाँ से निकालकर वारणा- बत्त नगर को भेज दीजिए । ऐसा दो जाने पर फिर हमें उनकी तरफ से कुछ भी खटका न रहेगा पुत्र के ये बचचन सुनकर तनिक सेप्वकर धूतराष्ट्र ने कद्दा--देखो पाण्ड नित्य धर्म के मार्ग पर चलनेवाले घर्मात्मा थे ।. वे बन्घु-बान्धवों से खासकर मुझसे धर्म के झलुसार दी व्यवद्दार करते थे। भोजन वख आदि किसी सामग्री का उन्हें लाभ न था । वे कुछ भी नम जानते थे मेरा ही दिया छुझ्ा खाते और पहनते थे ।. बे नामसात्र को राजा थे । राज्य का सब काम मुझसे पूछकर करते थे । पा के पुत्र युधिष्ठिर भी उन्हीं के समान धर्मात्मा गुणी यशस्वी शार नगरवासियों को प्यारे हैं । उनके चार भाई घर सब प्रजा के लोग सहा- यक हैं। मैं युधिष्ठिर को बलपूर्वक उसके बाप-दादे के राज्य से कैसे निकाल बाहर कर सकता हूं ? पाण्डु झपने मन्त्री श्र सेना के लोगों को पालते धर प्रसत्र रखते थे । मन्त्रियों शार सैनिकों के लड़के-बाले भो अब तक उनसे पाये हुए घन श्लौर जीविका से पतन रहे हैं। पाण्डु से नगरवासी झ्रादि जिन लोगों का सत्कार किया हैं वे इस समय युधिष्िर के साथ बुरा बर्ताव करते देखकर झवश्य ही हमारे विराधी बन जायँगे । वे हमको श्रौर इसारे बान्धवों को मारने के लिए क्यों न तैयार दो जायँगे दुयाधन ने कहा--पिताजी आप जा कह रहे हैं सो ठीक है। अपने में यह कमी देखकर मैं सारी प्रज्ञा को घन शार सान देकर अपनी वरफू कर लूंगा । वे अवश्य ही हसारी सददायता करेगे। इस समय मन्त्री मेरे दी के में हैं पार खज़ाना भी मेरे ही हाथ में है। इस कारण किसी सद्दज उपाय के द्वारा आप मटपट पाण्डवों को यहाँ से निकालकर वारणावत को मेज दीजिए । जब मैं राज्यासन पर बैठकर अपनी जड़ अच्छी तरह जमा लूँगा तब पुत्रों-सहित कुस्ती फिर यहाँ चल्ली झावेंगी । शरूतराष्ट्र से कहा--दुर्योधन तुम जा कह रहे हो उस बारे में मैं भी मन ही मन सोचता रहता हूँ किन्तु इसे दुष् विचार समझकर किसी के झागे प्रकट नहीं करता ।. भीष्म द्रोथ कप भार विदुर आदि में से काई भी यद्द सलाह न देगा कि पाण्डवों को हस्तिनापुर से निकाल दे... पुत्र कुरुवश के ज्ञोर्गों की दृष्टि में इम लोग धार पाण्डव दाना ही समान हैं




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