भारत सेवक | Bhaarat sevak

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Bhaarat sevak by यज्ञदत्त शर्मा - Yagyadat Sharma

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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( ५) बोले, “भारतसेवक सम्बन्धी सभी खोजपूर्ण तत्व इसमें आरा गये हें रमेश के दोनों कान विनय भाई के मुख पर केन्द्रित हो गये । उनके होठों से निकलनेवाली भारतसेवक की भूमिका को सुनने के लिए रमेश का हृदय और मस्तिष्क एकसूत्र में बंध गये । विनय भाई ने भूमिका प्रारम्भ की, “इधर कई वर्ष से भारतसेवक मेरे विचारों का केन्द्र बना हुआ है। भारतसेवक भारत की संस्कृति से सम्बद्ध पुराना शब्द है और इसका साधारण प्रथं भी भारतीय जनता में बहुत प्रचलित है। परन्तु श्राधुनिक युग की प्रगति ने भारतसेवक दब्द के महत्व को श्रौर बढ़ा दिया है। श्राज भारतसेवक के साधारण भ्रर्थ का प्रायः लोप , ही हो गया है और इसका विशेष अर्थ ही जनता में प्रचलित है । कलयूग में भारतसेवक को प्रभ्नु-सत्ता प्राप्त हो चुकी है ।” रमेश सुनता-सुनता उछल पड़ा और प्रसन्नतापूर्वक बोला, “प्रश्नु- सत्ता का प्रयोग आपने भारतसेवक के साथ बहुत सुन्दर किया । दो शब्दों में पूरी बात कह दी ।” विनय भाई का ध्यान इस समय रमेश के कथन पर नहीं গা । वह अपनी भूमिका के ही टूटे-फटे पन्‍नों को बटोरकर उनका क्रम मिला रहे थे। क्रम मिलाकर बोले, “हाँ तो में अभी-प्रभी भारतसेवक की प्रभ- सत्ता की बात कर रहा था। भारत-सेवक का स्थाव आज के युग में वही है जो सतयुग, त्रेता और द्वापर में राजा का होता था । सतयुग से समय बदलता-बदलता कलियुग तक झा गया। समय बदला, समाज बदला और राजा भी बदल गया। राजा ऐश-पसंद हो गया श्रौर कत्त व्यविमुख होकर अपने उत्तरदायित्व को भुला बेठा । उसने सेवा माता और जनता बहन से सम्बन्ध विच्छेद कर लिया। उसका जीवन रंगमहलों को रंगरेलियों में व्यतीत होने लगा। सत्ता के रूप और वेभव का जाल्न 'राजा' की आँखों में चरबी बनकर छा गया । राजमद में उसने सेवा माता, जनता बहन और उनके बालबच्चों का | 17 |




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