हिंदी वक्रोक्तिजीवित | Hindi Vacroktijeevit

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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` | भूमिका [ पुर्वं वृत्त ই ओर कदाचित्‌ रुष्यक की भाति श्रयलिंकार माना-है । परन्तु यह वात नहीं है- | तृतीय उद्यत मेँ उसके सामान्य रूप की भी स्पष्ड स्वीकृति है जहां उन्होने भामह को वक्रोक्ति-विषयक इस प्रसिद्ध स्थापना की पुष्टि की है :-- सपा सर्वत्र वक्रोक्तिरनयार््यो विभाव्यते । यत्नोऽस्यां कविना कार्यः कोऽलंकारोऽनया विना ॥ ¦ प्रतियोक्ति श्रौर वक्रोक्ति की पर्णायता स्वीकार करते हुए ्रानन्दवर्यन ল कल्ला हैः -{ ~~ सवते पहले तो सभी श्रलंकार अतिकरयोक्ति-गर्भ हो सकते हैं। महाकवियों रा विरचित वह्‌ (अन्य अलंकारों की अतिशयोक्तिगर्मता) काव्य को श्रनिर्दस्-य गभा प्रदान करती है। अपने विषय के अनुसार किया हुआ अतिदशयोक्ति का उ्त्रन्ध योग) काव्य में उत्कर्पं क्यों नहीं छाएगा। भामह ने भी सत्तिदायोक्ति के लक्षण मे ह कटा हैः-(जो मतिश्नयोक्ति पटने कहु चुकरे है सव अलंकारो की चमः का र-जननी ) यह्‌ सव वही वक्रोक्ति है । इसके हारा पदार्थं चमक उठता है । कवियों गे इसमें बिद्येप प्रयत्त करना चाहिए । इसके बिना अलंकार ही क्या है ? उसमें कवि की प्रतिभावरश अतिदायोक्ति जिस अलंकार को प्रभावित करती है, सको (ही) शोभातिशय प्राप्त होता है । श्रन्य तो (चमत्कारातिशय-रहित) श्रलंकार 1 रह जाते हैं । इसी से सर अलंकारो का रूप धारण कर सकने की क्षमता के प्रण श्रभेदोपचार से वही सर्वालंकाररूप है, यही अर्थ समझना चाहिए ।”--.(हिन्दी बन्यालोक पु० ३६४-६५) उपर्युक्त विवेचन का निष्कर्ष यह है कि आनन्दवर्धन के मत से (१) वक्रोक्ति श्रतिशयोक्ति की पर्याय एवं सर्वालंकाररूपा है, (२) उप्तका चमत्कार कवि-प्रतिभाजन्य है, । (ই) विपय का औचित्य उत्तका नियामक है अर्थात्‌ उक्रता अ्रथत्रा अतिशय का १ रोग विषय के अनु हूल ही होना चाहिए । है ह ¢ इस तीसरे तथ्य के हारा आानन्दवर्वन ने वक्रोक्ति को श्रपने सिद्धान्त कै अन- सन में ले लिया है । प्रत्यक्ष रूप में श्रानन्‍्दवर्धन के ग्रन्थ में बक्रोक्ति की इतनी ही चर्चा ह। मौर ' डृ भी अतिशयोक्ति के द्वारा । किन्तु अप्रत्यक्ष रूप में उनके ध्वनि-निरूपण का कु तक वक्रोक्ति-विवेचन पर गहरा और व्यापक अभाव है । वक्रक्ति-जीवितम की रूपरेखा .




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