आदर्श-महात्मागण | Adarsh Mahatmagan

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Adarsh Mahatmagan by चतुर्वेदी द्वारकाप्रसाद शर्मा - Chaturvedi Dwarkaprasad Sharma

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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छः आझादश-महाःत्मागण खपिलवक्त के पास ही दवेवहेंडा नामक एक লাজ था: जिसमे सभूति शास्य रहना घा । सुसूति उछ शमम का अधि पति था | उसने करभठ লাস के कालीयपंश की एक कन्या के साथ विवाह किया और उससे खान कन्या उत्पन्न कीं ! उसके काई গুল লী হা জি नहीं, यह नहीं जाना जा सकता । उसकी कन्याझी के नाम ये थे--माया, महामाया, झतिमाया, अनन्‍्तमाया- चुलारा, कोलोसेवा और महाभजापति । राजा सिंहहनू के परल्लोकवासी हाने पर, उसका उ्येष्ठपुत्र शद्धादन मदी एर वैडा श्रौर उसने उपरोक्त खुमूति-शाक्य की प्रथमाः कन्या माया भर सब से छोटी कन्या महाप्रजापति के साथ विवाह किया ¦ विवाह होने के बारह वर्ष बाद शुद्धोद्न के झोरस से ओर मायादेवी के गर्भ से शाक्यसिह उत्पन्न हुए. । बुद्धदेव का जन्म भूगेाल-प्रेमियों से नेपाल राज्य का नाम अपरिचित नहीं है। इसी नेपाज्ञ राज्य के झन्तगंत फपिलवस्तुक नामक एक नगर था, जिसमें शाक्य-वंश सम्दूत राजा श॒ुद्धोदृव की राजधानी थी | महाराज शुद्धादन के पल रानियाँ थीं, उनमें मायादेंवी पठरानी थी | मायादेवी जैसी रूप में अद्वितीया यी, वेसी ही वह झतुत्तबनीया गुणवती भी थी। महाराज डसके रूप लावशय पर ऐसे मुग्ध ही गये थे कि, ते उसे अपनी आँखों की झोड एक क्षण के भी नहीं करते थे।वे उसके क्रेवल शारीरिक सन्द च्य पर ही विभाहित थे से नहीं, किन्तु मायादेवी ने अपनी कर्तंव्य-प्रियवा, आप्म-संयम, घम-निष्ठा आदि अलोकिक गुणे नः कपिलवस्त क प्रचद्धिसं नाम “ कौहना'ः है !




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