देश - दर्शन | Desh - Darshan

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Desh - Darshan by ठाकुर शिवनन्दन सिंह - Thakur Shivanandan Singh

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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१५ कोई ६० वर्ष पहले देहली कालेजके पंडित धघर्म्मनारायणजीने इस विषय पर दो किताबें उद्‌में लिखीं । रावसाहब विश्वदाथ नारायण और पंडित कृष्णशास्त्रीने दो एक पुस्तकोंका अनुवाद मराठीमें करके दक्षिणमें इस शाख्त्रका प्रचार किया । गुजराती आदि और और भाषाओं में भी इस विषय पर कई पुस्तकें प्रकाशित हुई । हिन्दीमें सबसे पहले सन १९०७में पंडित गणेशदत्त पाठकने एक छोटीसी पुस्तक निकाली । बादको हिन्दीके स॒प्रसिद्ध लेखक पण्डित महावीरप्रसाद द्विवे- दीने अपना महत्त्वपूर्ण सम्पत्तिशास्र प्रकाशित किया । ग्रो० बालकृष्णजीने भी इसी विषय पर एक उत्तम पुस्तक लिखी । कोई दो वर्ष पहले पं ० गिरिधर शर्माने मिसेस फासेट एलएल. डी, के अर्थशाशत्रका अनुवाद लिखा। मतलब यह कि क्रमशः हिन्दींमें भी इसका प्रचार होने लगा । सम्पत्तिशास्रका विषय बहुत ही गहन ओर कठोर है। इस शाखत्रका सम्बन्ध व्यापार ओर राज्य-व्यवस्थासे बहुत अधिक है। सम्पत्तिशाख्रके विचारमें और शात्रोंका भी काम पढ़ता है। उनकी मददसे इस शास्रके सिद्धांत निश्चित किये जाते हैं। नीतिशात्र, जीवनशास्र, जनसंख्याशासत्र आदिकी मदद लिये बिना इस शाका काम नहीं चल सकता। सम्पत्तिशासतत्रका सम्बन्ध जनसंख्यासे है और जनसंख्याका विषय बड़े महत्त्वका है। भारतमें इस विषय पर ध्यान आकर्षित करानेकी बहुत बड़ी आवश्यकता है । जितनी भूख है उससे यदि हम अधिक खा्येंगे तो हमें बदहजमी हो जायगी और हम बीमार पड़ जायेंगे । यदि माली पेड़-पत्तोंकी काट-छोट न करे तो बहुत जल्द ही खूबसूरत बाग जज्ञलकी शक- लमें बदल जाय ओर वहाँ शोभा और शांतिके स्थान पर कुरूपता ओर अशांतिका दोरदोरा हो जाय । इसी तरह यदि किसी जातिकी जनसंख्या एक नियत सीमाका उल्लंघन कर जाती है, तो उस जातिमें अनेक बुराइयोंकी बृद्धि दोने लगती हे और उस जातिका अधःपतन होना प्रारंभ हो जाता है। प्रकृतिने हर बातके लिए एक नियम, एक सीमा बना रक्सी है। उस नियमको न जानकर उसकी नियमित सीमाका उछंघन करना ही ग्रकृतिका नियम तोड़ना है। और यह बतानेकी आवश्यकता नहीं है कि दर अवस्थामें प्रकृति-नियमके प्रतिकूल काम कर- नेसे अनेक बाधायें और उपद्रव आ खड़े होते हैं । प्रसिद्ध अँगरेज लेखक ओर तत्त्ववेत्ता माल्थस साहबने जनसंख्या-विषरय पर खूब विचार करके सन्‌ १७९८ ३० में जनसंख्याके नियम पर एक निबंधावली ( ८588४ 0) 18 एणा॥८७1 ० 09০20196101) ) लिखी । उसमें उन्होंने




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