देश - दर्शन | Desh Darshan

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Desh Darshan by ठाकुर शिवनन्दन सिंह - Thakur Shivanandan Singh

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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दे वह इस दास्र-रचनाके मार्गका और भी अधिक अवरोधक हुआ । और यह अख- ण्डनीय सिद्धान्त है कि बिना कारणके कार्य नहीं होता । गरज यह कि भारतमें इन बातोंका प्रेरक कोई कारण ही नहीं उपस्थित हुआ इसीसे यहाँके विद्वान सम्पत्तिशास्रकी उद्धावना करने उसके सिद्धांत हूँढ़ निकालने और संपत्तिका भ्रचाह रोकने आदिके बखेड़ेमें नही पढ़े । में अपनी खेती करता हूँ और श्रातःकाल उठकर अपने हल और बैलोंको प्रणाम करता हूँ । मेरा जीवन जज्ञछके पेड़ों और पक्षियोंकी संगतिमें गुजरता है। आकादाके सुन्दर बादलोंको देखते देखते मेरा दिन निकल जाता है । मेरे खेतमें अन्न उग रहा है बिस्तरके ढिए पृथ्वी वख्रके ठिए कमली कमरके लिए छैगोटी और सिरके ठिए चोटी काफी है । मेरे हाथ पाँव बठवान्‌ हैं भूख खूब लगती है बाजरा और मकडई छाछ और दही दूध और मक्खन मुझे और मेरे बच्चोंको मिठ जाते हैं-फिर संसारमें क्या हो रहा है इससे मुझे प्रयोजन १? और न जान नेसे मेरी हानि १ में किसीको घोखा नहीं देता सेरे इइलोक और परलोक दोनों बन रहे हैं । हाँ यदि मुझे कोई धोखा दे तो उसका फल वह ईश्वरसे पावेगा। यद्द कौन कह सकता है कि इस सादगी और सचाईका जीवन अच्छा नहीं पर कठिनतान्यट छेकि इसे प्रकारका निर्विघ्न जीवन बहुत दिनों तक नहीं व्यतीत हो सकता । धर्मद्दी के सद्दारे जाति उन्नति कर सकती है यह ठीक है। परन्ठु वह धम्मडर जो जातिको उन्नत करता है इस भोके भोछे पवित्र बेवकूफीके ढेर पर नहीं उगता । वह कठोर जीवन जिसे देशदेशान्तरोंको ढूंढ़ निकाले बिना शान्ति नहीं मिलती जिसकी अन्तज्वांछा दूसरी जातियोंको जीतने छटने मारने और उन पर राज करनेके बिना मन्द नहीं पड़ती-केवल वहीं विशाल जीवन समु- द्रकी छाती पर दाल दढकर जंगलोंको चीरकर पद्दाड़ोंको तोड़-फोड़ या फौंद कर उदय-अस्ततक राज्य जमा सकता है और राज्य कर सकता है । शान्तिथ्रिय भारतमें साहित्य संगीत कला और सम्पत्तिकी अतिसे आलस्य विषय-विक्वार डा ढ्ेष आदि अनेक दोष आगये । जंगल और पह्- ढॉको हिला देनेवाढी पवित्र आर्यजाति घोड़ेसे उतर कर मुलायम तकियोंके सद्दारे मखमली गद्दों पर ऐसी सोइई कि न यह आप जागी और न कोई इसे जगा ही सका ।




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