विज्ञान कोश | Vigyan Kosh

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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न अद्रें नकारा ही शीर्प ध्वनिकों दी ध्वनि बनाती है और वह अक्षरका आधार बन जाती हैं वीर्ष और स्वर-व्यंजन--स्वर ध्वनियों अपेक्षाकृत अधिक मुखर होती हैं साथ ही उनका उच्चारण भी देरतक ओर सरलता- से हो सकता है इसी कारण बे व्यंजनकी तुलनामे अक्षरका आधार या शीर्प ध्वनि बनने के अधिक उपयुक्त हैं और इसी कारण संसारकी अधिकांश भाषाओंके अधिकांश अ- क्षर स्वरपर ही आधारित होते है । हिन्दी आदि भारतकी आधुनिक प्रायः सभी आएं भाषाओंमें अक्षरकी शीर्प ध्वनि स्वर ही है । अपनी इसी विशेषताकें कारण भाषामें स्वरका अधिक महत्त्व रहा है और उसे स्वतंत्र राजा आदि कहा गया है और दूस- री ओर व्यंजनकों परतंत्र या स्वरपर आधा- रित कहा गया है। स्वयं राजन्ते स्वरा अ- स्वगू भवति व्यब्जनम्‌ । इस प्रकार अक्षर- का शीर्ष या आधार संसारकी सभी भापा- ओऑंमें प्रमुखत स्वर ही होता हैं किन्तु कुछ भाषाओंमें कूछ व्यंजन भी अक्षराधार या दीप रूपमें मिलते हैं। तत्वतः ऐसे व्यंजनों को स्व॒रवत्‌ व्यंजन कहना चाहिए क्योंकि वह व्यंजनका कार्य छोड़ स्वरका कार्य करने लगता है । ऐसे व्यंजनोंको भाक्षरिक ब्यंजन | का6 0008010970 भी कहते हैं । सेनादी बेल्ला कूला जापानी रूसानियन चेक जर्मन अंग्रेज़ी तथा बहुत-सी अफ्रीकी भाषाओंमें इस प्रकारके आक्षरिक व्यंजन या अक्षराधार शी व्यंजन मिलते है । मूल भारोपीय भाषामें र ल म न आदि- की लगभग ऐसी ही स्थिति थी । वैदिकी तथा पूर्व चेदिकीमें ऋ लू भी कुछ इसी रूपमें स्वर माने जाते है । अंग्रेज़ीमें भी न तथा ल व्यंजन कभी-कभी आक्षरिक ४11- 91210 या स्वरवत्‌ प्रयुक्त होते है जेसे ए0पर्00 000 016 में । चैक . भाषामें र ध्वनि आक्षरिक है। एक वाक्य हैं 8070 80 802 दा गलेमें उँगली दबाओ । यह ध्यान देने योग्य है कि नपकनपकपन कसर जा । । इस पूरे वाक्यमें एक भी स्वर नहीं है आर केवल र्‌ ही स्वरका काम वर रहा दा है । जर्मन भापामं हू म और लू व्यंजन आधष- रिक हैं । अफ्रीकाकी बहुत-सी भागाओंसे र्‌ मु तू झ आधरिक है । जापानीग रु ण म्‌ तथा चीनीमे ज आक्षरिक हैं । इस प्र- कार र्‌ लू सन नु मु हा. आदि अगे- क्षाकृत अधिक मुखर व्यंजन भी अक्षरमें कभी शीर्पका काम करते हैं । आक्ष रिक व्यंजन- के नीचे उसकी आक्षरिकता दिखानेक लिए एक छोटी खड़ी रेसा खींच देते हैं जैसे म्‌। गहवर और स्वर-व्यजन-जिस प्रकार स्वर प्राय अक्षरमें शीर्ष होते हैं उसी प्रकार ब्यं- जन प्रायः अक्षरमें गहवर होते हैं किन्तु जिस प्रकार कभी-कभी कुछ व्यंजन भी स्वरवत्‌ बन दीर्प हो जाते हैं उसी प्रकार कभी-कभी कुछ स्वर भी व्यंजनवत्‌ बनक गह्वर बन जाते हैं । संयुक्त स्वरमें दोनों स्वर मुखरता या प्रमुखताकी दृप्टिसि बरा- वर नहीं होते । ऐसी स्थितिमें कम मुखर या अप्रमुख स्वर व्यंजनवत्‌ स्वर माना जाता है । बहुत ठीक या बंज्ञानिक न होनेपर भी सरलताके लिए ऐसी स्थ्रितिमें पूरेको अक्षर मुख स्वरकों शीप्प॑ और अप्रमुख स्वरकों गहवर कहते है । 91 का 1 श0 का ए इसी प्रकार गहृवर हैं । अक्षरके भेद--अक्षर दो प्रकारके होते हैं- बद्धाक्षर 01086 011001 या. ७10800 30118 010 और मुबताक्षर 100 या 07007 8 10.010 । जब अक्षरकी अंतिम ध्वनि व्यंजन हो उसे बद्धाक्षर कहते हैं जसे आप एक सीख । इसके विरुद्ध जब अक्षरकी अन्तिम ध्वनि स्वर हो तो उसे मुक्‍्ताक्षर कहते है जैसे जो या कि खा ले । अक्षरकी स्वाभाविकता और प्राचीनता-- जैसा कि पीछे सकेत किया जा चुका है अक्षर वर्ण या ध्वनिग्रामसे पहले ज्ञात हुआ और इस प्रकार अधिक प्राचीन है । इसी प्रकार यह वर्णकी तुलनामें अधिक स्वा- भाविक भी है । प्रैफ़ और ग्रे आदि अनेक जबकि पपालंग कवि तटकवसमपकपकपनसाला




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