अंधा युग | Andha Yug

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Andha Yug by धर्मवीर भारती - Dharmvir Bharati

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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न इस रसणीय झुप् दो नहों दा रहाँ सस्कति थी यह एक दुढे भौर सो जिसको सनानो ने महायुद्ध घोषित क्ए जिसके घरघेयन में मर्यादा चतिठ भा वेश्या-सी दर प्रजाजनों को भी रोगी बनातो रिरो उस भन्पी सम्कृ्ति ँ उस रोगी मर्यादा की रक्ता हम करते रहे सब्ह दिन 1 झा प्रहरी १ जिसने भव हमको धरा डालता मेहनत हमारी निरपंरु थी मास्पा का साहस का श्रम का अस्तित्व का हमारे कुछ भर्थ नहीं था कुछ मी भर्य नही था प्रहरी २ भ्र्य नही था कुछ भी झप नही था जोवन के भषहीन सुने गलियारे में पहरा दे-देकर अब थके हुए है हम अब चके हुए है हम चुप होवर बे आर पार घूमते हैं। रातुसा र ज पर भी हो जाता है । नेपध्य से आँधी बी सो ध्यर्ति आती है। एव प्रतुरी शगा करे सुनता है दूसरा भौहो पर हाथ रख भर आनाश भी भोर देखा है।




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