श्री जैन दिवाकर जी का संक्षिप्त परिचय | Shri Jain divaakar ji kaa sankshipt parichay

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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श्रो ) सकटप उत्पन्न होता दै । बह इन दुखो की परम्परा से छुटकारा चने का उपाय सोजता दे | इन दारुण च्रापदाध्या स सुक्क होने की उसकी आन्तरिक. भावना जाग्रत डो उठती है | जीव का इसी वस्था को (नवेद्‌' कहते हं । जव सखसार सं जच बेरक्त या विम्मुख बन जाता हूँ ता वह लसार स पर-कंसखा आर साक का कासना करता ६-मात्त चाद्ता ह। मुक्लि की कामना के वशीभूत हुआ मनुष्य किली “गुरु! का अन्वेषण कर्ता है। गुरुजी के चरण-शरण होकर वह उन्हे आत्मसमपेण कर देता दें । श्रवोच वालक की भाति उनकी अंग्रुलियां के इशारे पर नाचता है। भाग्य से यदि सच्चे गुरु मिल गए तब तो ठीक नहीं तो एक बार भ्रद्दी स निकल कर फेर उसी अभ्रद्टी में पड़ना पड़ता है। লন তথা क्या है! वे कोन से गुरु है जो आत्मा का ससार से. निस्तार कर सकने मे ससन्त दँ ? यह प्रष्न प्रत्येक श्रात्महितैषी के समन्त उपस्थित रहता ह । यदह निश्रथ-प्रवचन इस प्रश्न का तोष जनक समाधान करता है ओर ऐसे तारक ৬ गुर्आ का स्पष्ट ডা हमार सामने उपास्थत कर दृता ६ । ससारमे जो मतमतान्तर उत्पन्न होते हं, उनके मूल कारणो का यदि अन्वेषण किया जाय तो मालूम होगा कि कषाय ओर अन्ञान दही इनके मुय बीज ছু | शिव राजषि को अवधिशान, जो कि श्रपूरे दोताहै, हुश्रा । उन्हं साधारण मचुरष्या की अपेक्ता कुछ अधिक बोध होने लगा। उन्होंने मध्यलेक के .अखरूयात द्वीप समुद्रों में से सात द्वीप-समुद्र ही जान पाये | लेकिन उन्हें ऐसा भास होने लगा मानों वे सम्पूर्ण ज्ञान के धनी हो गए है ओर अब कुछ भी जानना शेष नदींरहा। वख, उन्होने यद घोषणा कर दी कि सात ही द्वीप समुद्र हैं--इनसे अधिक नहीं। तात्पये यह दे के जब कोई व्याक्के कुल्ान या अज्ञान के द्वारा पदार्थ के वास्तविक सखरूप को पूृणु रुप स नहीं ज्ञान पाता ओर साथ ही एक धर्म अ्रवर्तेक के रुप मे -होने वाली प्रतिष्ठा के लाभ को संचरण भी नद्दीं कर पता तब वह सनातन सत्य मत के विरुद्ध एक नया ही मत ज्ञनता के सामने रख देता है और भोत्ती भाली जनता उस ন- मूलक मत के जाल में फस जाती । विभिन्न मतों की स्थापना का दूसरा कारण कपायोेद्रेक हे । किसी व्यक्ति मे कभी कषायं की बाढ़ आती देतो वह क्रोच के कारण, साल-बड़ाई के लिए अथवा- दुसरों को ठगने के लिएं या किसी लोभ के कारण, एक नया दी सम्प्रदाय. बना कर खड़ा कर देता दै । इख भ्रकार अज्ञान और कषाय की करामात के कारण मुमुच़ु লা को सच्चा मोक्ष-माग ढूँढ निकालना अतीब दुष्कर कार्य हो जाता है । कितने ही लोग इस भूल भूलेया में पड़कर ही अपने पावन सानव जीवच को यापन कर देते हैं ओर कई कझुभला कर इस ओर से घविसुख हो जाते है । जित सरोजा तिल पाइया ? की चीति के अनुसार जो लोग इस वात को भली. ৬১ ৬৬৬১ ১২ 4৯৬ न ৯১ नः भांति ज्ञान लेते हैं कि सब प्रकार के अज्ञान ले शल्य.अर्थात्‌ सर्वेक्ष और कषायो को




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