श्री रोहिणीव्रत कथा और रोहिणीव्रतोद्यापनम | Shri Rohinivrat Katha Aur Shri Rohinivratodhapanam

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Shri Rohinivrat Katha Aur Shri Rohinivratodhapanam by पं पन्नालाल जैन साहित्याचार्य - Pt. Pannalal Jain Sahityachary

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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रेष्दिणोत्रत कथो [९१ ~~~ प्रकाय+ रहास उच्सल दिव्य पिन रव न्या] उम सिंदांसन বহর সপ বাতা द्रतार्नि रत्न और सुचणन बने, क्षीर॑- सागर जलते भर और कमल पुष्पोम आउत्त मुखयार एक्‍्सौ आर कललो दारा अमिपक किया, तम उत बाटोवित आभूपर्णाम क्रिमूधित शिया । इस प्रसार খায় গীতা কলা हुआ उस अशाक बूष्क शिपर पर वियमान था। ऊप राना अशोरन नीचरी आर झाँशा तो অযা হল ৫ কি रोडिणीया बालक अशो# बृस्तत्री चाटी पर सिंदासनमे লিহাল্ল है, अपनी गम दिशाआजा सुगीयत करनयाल पुष्प हया धप आटिस उमफी पता द्वा रही है, दबदा अपन हाथम म्थित कटरास उपरा अभिपक कर रह हैं, और दिव्य आमरणास पिभृषित क्या गया दे। यह सफर सता प्रसन ग्हनयाटा महस्ाक्ष, महायुद्धिमान सरीण मन्‍्त्री, महासत् शोक, प्रण परनंत्राटी হস্ত तथा पुरोद्चित आरि सभा लोग प्रयमयम राहिणात्र ड्वारा पिय हुए उपदा अर्‌ उत फरमे परम आश्चयक प्राप्त हुए 1 सटनन्तर आश्रयैस भर তে ঘ লন राग दयाप्नोन सव आभरणोंस सुभूषित उमर बाल्यत्र पाम आननतस स्थित हुए। मागफ़शर, चम्पक, अनो, नमर जीर मौरिध्रीय ब्रतास व्याप्त तथा आम एवं मिलाया आदि वृक्षास सम्पन्न उप अशार बनम अनिभेनि, महायूति, त्रिभूति और अम्नर तिलक नामर चार तिगमन्दिर थ।॥ उमी सप्रय झ्यउम्म और मुप्रणवुम्म नामक द। चारण ऋद्धिधारी मुनिगंत्र दिद्धार करत हुए हृश्ष्नापुरनगरम पयार, और प्रवदिराम समुसन्न महा” ना मद्दाभूवितिल्क नामक तिनमदिर्म विरावमान हुए) লহুনদ্নং ঘ ঘি ঘযল নাজ আক হালা অশীরশ্ব ভি হটিযালকা सथ प्रतान्ते कदा { वनपारर घचन सुनम्र अक्तिसे राचाव शरीरम रोमांच उठ आय | ये वड वैभयक्ष साथ मुनिरातर समीप पहुये । তুল সিল হীনাঁ জুন্যিশাক্ী ৭ ^




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