प्रार्थना प्रबोध | Prarthana-prabodh  

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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प्राथंना की महिमा १४ नाश करने के लिए नम्रतापूतेक प्रार्थता करते हैं । इसी भाव से परमात्मा की प्रार्थना करना उचित है। अगर तुम भ्राशा को नाश करने के बदले सांसारिक पदार्थों -- घन, पुत्र, स्त्री झादि के लिए प्रार्थना करोगे तो संसार के पदार्थ तुम्हें लात मार कर चलते बनेंगे झ्नौर तुम्हारी आशाएं' ज्यों की त्यों श्रधूरी ही रह जाएगी । हां. अनर तुम त्राला- तृष्णा को नष्ट करने के लिए अन्त:करण में पूर्ण निस्पृहं वृत्ति जागृत करने के लिए ईश-प्रार्थना करोगे तो संसार के पदार्थ - जिसके तुम भ्रधिकारी हो-तुम्हें मिलेंगे ही, साथ ही शाति का परम सुख भी प्राप्त होगा । अतएव भ्राजा को नष्ट करने की एकमात्र आशा से परमात्मा की प्रार्थना करो । यह मत सोचो--ईश्वर तो कभी दिखता नहीं है, उससे प्रेम किस प्रकार किया जाय ? अगर ईश्वर नहीं दिखता तो संसार के प्राणी, कीड़ी से लगाकर कु जर तक, समान है। इस तत्त्व पर विचार करोगे तो ईव्वर से प्रेम करने की बात ग्रसम्भव न लगेगी । ईश्वर नहीं दिखता तो न सही, संसार के प्राणियों की ओर देखो और उन्हें भात्म-तुल्य समभो। सोचो-जंसा मैं हूँ, वेसे ही यह हैं, इस प्रकार इतर प्राणियों को अपने समान समभने से शने:-शर्ने ईश्वर का साक्षात्कार होगा--परमात्मतत््व की उपलब्धि होगी - श्रात्मा स्वयं उस शुद्ध स्थिति पर पहुँच जायगा । तात्पयं यह हैं कि ईश्वर का ध्यान करने से आत्मा




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