रवीन्द्र - साहित्य भाग - 14 | Ravindra Sahitya Bhag - 14

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Ravindra Sahitya Bhag - 14  by धन्यकुमार जैन - Dhanyakumar Jain

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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विसजेन : नाटक १७ देवता क्या सब-के-सब रसातलम चले गये १ सिफं दानव ओर मानव मिलकर दर्षके साथ विख्का राज्य भोग रहे हैं १? देवता अगर नहीं रहे तो न सही, ब्राह्मण तो हैं। ब्राह्मणके रोष-यज्ञमें राजदण्ड और सिंहांसन हविकाष्ठ बनकर रहेगा ! (जयसिंहके पास जाकर स्नेहके साथ) वत्स, आज तुम्हारे साथ मेंने रूख्ा आचरण किया है, चित्त मेरा अत्यन्त छुब्ध है आज । जयसिंह--क्या हुआ है प्रभु ! रघुपति-- क्या हुआ है १ पूछो अपमानिता त्रिपुरेश्वरीसे । इस मुहसे केसे कहूँ कि क्‍या हुआ है । जयसिंह---किसने किया है अपमान १ रघुपति -गोविन्द्माणिक्यने । जयसिंह--गो विन्दमाणिक्यने / किसका अपमान किया है प्रमु १ रघुपति--किसका अपमान ! तुम्हारा, हमारा, सर्वेशासत्रका. सर्वदेशका, सवकालका, सर्वेदेश-कालको अधिष्ठात्री महाकालीका, सबका किया है अपमान तुच्छ सिंहासनपर बेठकर, माकी पूजा-वलि निषिद्ध कर दी है दम्भमें आकर ! जयसिंह-- गो विन्दमाणिक्यने | रघुपति--हाँ, हाँ, उसीने, तुम्हारे राजा गोविन्द्माणिक्यने ! तुम्हारे सवश्रेष्ठने, तुम्हारे प्राणोंके अधीख्वरने | अक्ृृतज्ञ | बचपनसे पालन किया है मेंने तुझे, कितने स्नेहसे, कितने जतनसे,- आज मुमसे भी प्रिय हो गया तेरे लिए गोविन्दमाणिक्य ! जयसिह --प्रभु, पिताकी गोदमें बेठा छुद्र मुग्ध बालक आकाशकी तरफ हाथ बढ़ाता है पूर्णचन्द्र पानेको;-देव, तुम पिता हो मेरे, पूर्णचन्द्र हैं महाराज गोविन्द्माणिक्य !- किन्तु यह कया बक रहा हूँ में। अभी-अभी क्या सुना मेने ! माकी पूजाकी वलि रोक दी हे राजाने ! यह आदेश कौन मानेगा ! रघुपति--जो नहीं मानेगा उसे निर्वासन-दंड दिया जायगा !




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