भारतीय संस्कृति | Bharatiy Snskriti

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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भौगोलिक विवेचन ५ भारत । भारत के प्राचीन इतिहास को समझने के लिये इन विभागों को समझना आवश्यकीय है । उत्तरीय मेदान हिमालय व विन्ध्याचल के मध्य में स्थित है, व इसमें पन्चाब, संयुक्तप्रान्त, बिहार व बच्चा का समावेश होता है । इस मैदान में पत्थर का नाम नहीं है व इसमें से बहुतसी नदियें बहतीं हैं । परिणामतः यह बहुत उपजाऊ है । इसीलिये यहां मनुष्यों की आबादी भी बहुत घनी है । प्राचीन काठ से ही यह भाग राजनेतिक परिवर्तनोंका केन्द्र रहा है । आयों ने इसीमें अपनी संस्क्ृतिको विकसित किया, अपने बड़े २ साम्राज्य स्थापित किये व यहींसे दक्षिण पर अधिकार जमाया था । यहींपर मानव व ऐलवंशीय, इक्ष्वाकु व पुरूरवस के वंशर्जों ने अपने २ राज्य का विस्तार किया था । बाहंद्रथ, शशुनाग, नंद, मोय्य, गुप्त आदि साम्राज्य यहीं पर बने व बिगड़े । इस प्रकार भारत के राजनेतिक इतिहास में उत्तरीय मैदान का अधिक महत्त्व है। दक्षिण की उच्च- समभूमि के दोनों सिरोपर, पूर्वी व पश्चिमी घाट पहाड़ हैं व विन्ध्याचलू से' तुङ्गभद्रा तक इसका विस्तार है । यदह भाग उत्तरीय मेंंदान के समान उपजाऊ नहीं है । इसके मध्यभाग में घना जंगल है, जो कि आजकल मध्यप्रान्त के बेतूल, भंडारा, बालाघाट, मंडला आदि जिलों में स्थित है । इसे आजकल गोंडवाना' कहते हैं । प्राचीन कालमें यह “महाकान्तार” कहाता था, जिसका उल्लेख समुद्रगुप्त के स्तम्भलेख में किया गया है । इस भागने भी भारत के प्राचीन राजनतिक इतिहास मँ अपना दाथ र्वेटाया था; यह उत्तरीय मेदान की बराबरी तो नहीं कर सका । चद्रवी ययाति के ज्येष्ठ पुत्र यदुने यहीं पर राज्य स्थापित कर अपना वंश चलाया था । रष्क, आन्ध्र, चाद्य, राष्ट आदि राज्यवंशों ने यहां राज्य किया व भारतीय संस्कृति के विकास में अपना दाथ बटाया । यहां के राजाओंने साधारणतया उत्तरभारत को जीतने के बेसे प्रयत्न नहीं किये जंसे कि उत्तरीय भारतीयों ने दक्षिण के लिये किये थे । अशोक, समुद्रगुप्त, अकबर आदि के इस दिशा मँ प्रयल सफल रहे । दक्षिण- भारत में प्राचीन कालसे ही पांज्य, चोल, केरल आदि राज्य स्थापित हुए थे । पुराण तो इन्हें भी उत्तर भारतीयों से ही सम्बन्धित करते हैं, किन्तु ऐतिहासिक दृष्टिसे' यह कथन कहां तक ठीक है, यह कहना कठिन है । इस भाग का सिंहलद्वीपसे' राजनेतिक सम्बन्ध विशेष रूपसे रहा हे । सांस्कृतिक दृष्टि से




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