मनीषा अभिनंदन ग्रन्थ | Manisha Avhinandan Granth

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लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
41 MB
कुल पष्ठ :
711
श्रेणी :
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लेखक के बारे में अधिक जानकारी :
पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)25 दिसम्बर 2005 को कोलकाता में उन्हे त्रिदिवसीय विभिन्न धार्मिक, सामाजिक आयोजनों के साथ समर्पित होने
जी रहा है।यह अभिनन्दन ग्रन्थमनीषा मे रचना के मूल रूप ओर रचनाकार के मूल अभिप्राय को अक्षुण्ण रखते हुए अनेक रचनाओं में
आवश्यक परिवर्तन “परिवर्धन ओर संशोधन करने पडे है । सम्पादक का कार्य दुष्कर होता है। उसे अनेक
लता-पादपों से विविध प्रकार के पुष्य चयन कर एक मनोरम माला में गुंधने होते है । हमने भी अपने सहयोगी
सम्पादकों के साथ परामरशपूर्वक यथासम्भव रुचिकर रचनाओं का चयन किया है। वे कैसी, क्या है, यह निर्णय
सुधी पाठक ही कर । 'मनीषा' में प्रकाशनार्थं देश के कोने-कोने से बहुमूल्य सामग्री प्राप्त हुई, किन्तु ग्रन्थ की
सीमित पृष्ठ संख्या के कारण विविधा खण्ड हेतु अनुरोधपूर्वक प्राप्त की गयी कुछ सामग्री हार्दिक इच्छा होते हुए
भी प्रकाशित नहीं कर सकने का सन्ताप मन मे बना हुआ है। एतदर्थ माननीय विदान् लेखकों से हम विनम्र
क्षमाप्रार्थी हैं।ग्रन्थ का प्रतिपाद्यइस 'मनीषा' अभिनन्दन ग्रन्थ में माननीय प्राचार्य जी के जीवन, व्यक्तित्व, वैदुष्प और सृजनशीलता के
साथ-साथ उनके प्रति शुभाशीष, शुभ कामनाएँ, विनयांजलि और संस्मरणों का समावेश तो किया ही है, उनके
कृतित्व को भी समीक्षा के निकष पर परखा गया है। कुछ महत्वपूर्ण विद्वानों/विचारकों/समाज क कर्णधारं से
माननीय प्राचार्य जी के सम्बन्ध में साक्षात्कार लेकर भी इसमें संजोया गया है।सर्वप्रिय प्राचार्य जी को यहौँ सम्पूर्ण भारतवर्ष के परमपूज्य आचार्य, उपाध्याय, साधु-सन्तों आर्यका माताजी,
एेलक, क्षुल्लक महाराजो ने अपने मंगल आशीषों से अभिसिंचित किया है। वहीं कर्मयोगी स्वस्ति श्री चारूकीर्ति
भद्रारक महास्वामीजी, श्रवणवेलगोला तथा मूडबिद्री एवं अन्य सभी भटारकवृन्द तथा धर्मस्थल के राजर्षिं डो.
वीरेन्द्र हिगडे सहित राष्ट्र के अनेक प्रमुख जननायकों की शुभकामनाएं तथा बधाई-सन्देश भी प्राप्त हुए हैं।ग्रन्थ के प्रथम खण्ड में-मंगल आशीष, सन्देश, सदभावना, शुभकामना आदि समाविष्ट है ।
द्वितीय खण्ड में-प्राचार्य जी के प्रति आदरांजलिर्यो, हमारे प्रणाम ओर संस्मरण सगुम्फित है ।तृतीय खण्ड में-प्राचार्य जी के आत्मकथ्य, भेट-वातर्पिं एवं उनके व्यक्तित्व तथा कृतित्व को अभिव्यजित
करनेवाली रचनाओं को संजोया गया है।चतुर्थं खण्ड मे -प्राचार्य जी के साहित्यिक एवं सामाजिक अवदान के विविध पक्षो को रेखाकित किया गया है।इस अभिनन्दन ग्रन्थ का पंचम ठण्ड विशेषतया तैयार किया गया है, जिसमे सम्पूर्ण भारतवर्ष मेँ बीसवीं
शताब्दी के प्रमुख दि. जैन मनीषियों के व्यक्तित्व एवं कृतित्व का परिचय समाविष्ट किया गया है। हमारा प्रयल
था कि इस खण्ड में राष्ट्र के सभी प्रदेशों के दि. जैन विद्वानों का परिचय रहे, किन्तु अनवरत आग्रह के बावजूद
अनेक लेखकों की ओर से यथेष्ट सामग्री या तो प्राप्त ही नहीं हो सकी या बहुत विलम्ब से प्राप। हई । पुनरपि
जो सामग्री दी गवी है, वह राष्ट्रीय क्षितिज पर जैन विदत्ता के विविध आयामो को रूपायित करने में समर्थ है।कृतज्ञता
हम पण्डितप्रवर प्राचार्य नरेदरपरकाशजी क चिरकृतज्ञ हैं, जिन्होंने सम्पूर्ण समिति और सम्पादक मण्डल को यह(४1)
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