काव्य के रूप | Kaavy Ke Rup

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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साहित्य का स्वरूप ३मानसिक ग्रतिक्रिया अथांतू विचारों, भात्रों ओर संकल्पों की शाच्दिक अभिव्यक्ति हे और वह हमारे क्िसी-न-क्रिसी प्रकारके हित का साधन करने के कारण संरक्तणीय हो जाती हे । साहित्य शब्द की व्युत्पत्ति भी इस परिभाषा को पुष्ट करती है। साहित्य शब्द का अथे है सहित होने का भाव--सहितस्यथ भावः साहित्य! । अब प्रश्न होता है कि सहित शब्द्‌ साहित्य शब्द का क्या अथ हैं ? सहित शब्द के दो अथे हैं-- की व्युत्पत्ति (८१) सह अथात्‌ साथ होना (२) हितेन सह सहित” अथात्‌ हित के साथ होना अथवा जिससे हित-सम्पादन हो । सह (श्चा ) होने के भावः को प्रधानता देते हुए हम कहेंगे कि जहाँ शब्द ओर अथ्‌, विचार और भाव का परस्परा- नुकूलता के साथ सहभाव हो वही साहित्य हे। शब्द और अथ का त होना स्वाभाविक रूप से ह। माना गया है। कबिकुल-चूड़ा- मणि कालिदास ने अपने रघुवंश के मंगलाचरण में शब्द और अथे के संयोग को अपने इष्ट पावती-परमेश्वर के संयोग का उपमान माना है ।% गोस्वामी जी न भी वाणी और अथ का सम्बन्ध जल और उसकी तरंग की भाँति एक दूसरे से भिन्‍न और अभिन्‍न दोनों ही माना हे-- गिरा अथ, जलन बीचि सम, कहियत भिन्‍न न भिन्‍न । बन्दीं सीता राम पद, जिन्हें सदा भ्रिय खिन्‍न । इस ग्रकार सहभाव में ही साहित्य की सामाजिकता का भाव लगा हुआ है । सहित का अथ 'हितेन सह सहित” लगाते हुए हम कहेंगे कि साहित्य वह है जितसे मानव-हित का सम्पादन हो । हित उसे ही कहते हैं जिससे कुड् बने, कुछ लाभ हो--विद्धातीति हितम!--- आनन्द भी एक लाभ हे । रुपये-आने-पाई का ही लाभ लाभ नहीं है । विधाता में भी हित का भाव है। हमारी परिभाषा में सहित होने का ओर हित होने का भाव है । श्रप्रेजी शब्द लिट्‌ चर ( 1.1८५.५- (৪০০) अक्षरों ([,७६८:७) से बना है। अक्षरों का जितना विस्तार हैপপ পা পপ পপ পাপী ~ শি টি क ज-------------~--~-- -- - --------~ ---- -----~~ ~ ~~ |रः वागर्थाविव सन्ण्क्तो वागरथ॑प्रतिपत्तये । जगतः पितसौ बन्दे पावंतीपरमेश्वसे ॥




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