पञ्च संग्रह | Panch Sangarah

[adinserter block="2"]
Add Infomation AboutDarabarilal Nyayatirth
लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
4 MB
कुल पष्ठ :
251
श्रेणी :
हमें इस पुस्तक की श्रेणी ज्ञात नहीं है |आप कमेन्ट में श्रेणी सुझा सकते हैं |
यदि इस पुस्तक की जानकारी में कोई त्रुटि है या फिर आपको इस पुस्तक से सम्बंधित कोई भी सुझाव अथवा शिकायत है तो उसे यहाँ दर्ज कर सकते हैं
लेखक के बारे में अधिक जानकारी :
No Information available about दरबारीलाल न्यायतीर्थ - Darabarilal Nyayatirth
पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)(५)न पूर्व करणाः प्राप्ता ये ते भिन्नक्षणस्थितैः !
गुणस्थानमिदं यातेरपूवेकरणास्ततः ॥ ३६॥
क्षपयन्ति न ते कमे शमयन्ति न कंचन ।
केवलं मोहनीयस्य शमनक्षपणोदताः ।। ३७॥
ये संस्थानादिना भिन्नाः समानाः परिणामतः ।
समानसमयावस्थास्ते मबत्यनिवृत्तयः | २८ ॥
ग्रेनानिवृत्तयस्तुल्या भावास्तुल्यक्षणश्रिताम् ।
तेनानिवृत्तयो वाच्या वान्यवाचक्वेदिमिः ॥ ३९ ॥
क्षपयन्ति महामोहविद्धिषं शमयन्ति ते ।
विनिमलत भीतरः स्थूलकोपादि वृत्तयः ॥ ४० ॥
पूर्वापृत्राणि विद्यन्ते स्पधेकानि विशेषतः ।
संज्वालस्पानुभागस्य यानि तेम्यो व्यपेत्य यः ॥ ४१ ॥
अनन्तगुणहीनानुभागो लोमे व्यवस्थित: ।
अणीयसि यथाथोख्यः सक्ष्मलो म: स संमतः ॥ ४२ ॥
लोमसंज्वलनः ब्रक्ष्मः शर्म यत्र प्रप्ते ।
क्षयं चा सयतः दृह्मः संपरायः स कथ्यते ॥ ४३॥
कोसुमोऽन्तम॑तो रागो यथावस्नेऽवतिषते ।
घरक्ष्मलोमगुणे लोभः शोध्यमानस्तथा तनुः ॥ ४४ ॥€ स्प्धकाना सहष्टिरिय-- ৮৮5০০७
५९५
বি 14.
क पूछ प७ ७७ ५ রি
५६ ५६ ५६५ (शेषममे षे )
User Reviews
No Reviews | Add Yours...