सामायिक - सूत्र | Samayik Sutra

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Samayik Sutra  by पृथ्वी चन्द्र - Prithvi Chandra

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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नें रुकावट नहीं डाल सकतीं । जहाँ समभाव है विश्वरक्षण वृत्ति है और उसका झाचरण है वहीं सामायिक है । बाह्य मेद गोण हैं मुख्य नहीं । प्राणि मात्र को झास्मवत्‌ समकते हुए सब व्यवद्दार चलाने का ही लाम सामायिक दै--सम + झाय + इक-सामाधिक । समन्समभाव प्सर्वत्र झात्मवत्‌ प्रवृत्ति जिस प्रदृत्ति से समता की सम- भाव की झमिवृद्धि हो वही सामायिक है । जैन शास्त्र में सामायिक के दो मेद बताए गए हैं--एक जब्य- सामाधिक दूसरा भाव सामायिक । सम भाव की प्राप्ति सम भाव का अनुभव झऔर फिर सम भाव का प्रत्यक्ष झाचरण--भाव सामायिक है । देसे भाव सामायिक की प्राप्ति के लिए जो बाह्य-साधन श्वौर अंतरंग- साधन जुटाए जाते हैं उसे द्रव्य-सामायिक कहते हैं । जो द्व्य-सामायिक हमें भाव सामायिक के समीप न पढुंचा सके वह द्रव्य-सामायिक नहीं किन्तु धन्ध-सामायिक है मिथ्या सामायिक है यदि श्रौर उम्र भाषा में कहें तो छुल सामायिक है । हम अपने नित्य प्रति के जीवन में माव सामायिक का प्रयोग करें यही द्रव्य सामायिक का प्रधान उद्देश्य है। हम घर में हों दुकान में हों कोट-कचहरी में हों किसी भी व्यावहारिक कार्य में और कहीं भी क्यों नहों सर्वत्र और सभी समय सामायिक की मौलिक भावना के अनुसार हमारा सब लौकिक व्यवहार चल सकता है । उपाश्रय या स्थानक में सावज्जं जोग॑ पच्चक्खामि -- पाप-युक्त प्रचृत्तियों का त्याग करता हूँ --की ली गई प्रतिज्ञा की सा्थकता घस्तुतः आर्थिक राजनीतिक और घरेलू ब्यवहारों में ही सामने श्रा सकती है । दद निश्चय के साथ जीवनमें सर्वश्र सामायिक प्रयोग की भावना अपनाने के लिए ही तो दम अतिदिन उपाश्रयादिक पवित्र स्थानों में देव-गुरु के समक्ष सावज्ज जोग॑ पच्चक्खामि की उद्घोषणा करते हैं सामायिक का पुनः-पुनः शम्यास करते हैं । जब इस अभ्यास करते-करते जीवन के सब व्यवहारों में सामायिक का प्रयोग करना सीख लें और इस क्रिया में मली भाँति




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