युक्त्यशासनं | Yuktynu Shasanam

[adinserter block="2"]
Add Infomation AboutDarabarilal Nyayatirth
Add Infomation AboutSheetal Sagar
लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
6 MB
कुल पष्ठ :
226
श्रेणी :
हमें इस पुस्तक की श्रेणी ज्ञात नहीं है |आप कमेन्ट में श्रेणी सुझा सकते हैं |
यदि इस पुस्तक की जानकारी में कोई त्रुटि है या फिर आपको इस पुस्तक से सम्बंधित कोई भी सुझाव अथवा शिकायत है तो उसे यहाँ दर्ज कर सकते हैं
लेखकों के बारे में अधिक जानकारी :
दरबारीलाल न्यायतीर्थ - Darabarilal Nyayatirth
No Information available about दरबारीलाल न्यायतीर्थ - Darabarilal Nyayatirth
शीतल सागर - Sheetal Sagar
No Information available about शीतल सागर - Sheetal Sagar
पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)१० युक्त्यमुशासमवीरके स्याद्राद-शासनको निर्दोष एवं अद्वितीय बताया गया है वह
युक्त है ।कारिका ३५-३६ में चार्वाकों ( भौतिकवादियों ) की उस प्रवृत्ति
( मान्यता ) कौ, जो 'शिब्नोदर-पुष्टि-तुष्टि --खाओ-पिओ और मजा-
मौज उड़ाओरूप है और लोकको पतनको ओर ले जाने वाखी है, मीमांसा
की गयी है ।कारिका २७,३८ और ३९ मे प्रवृत्तिरक्त एवं शम-तुष्टिरिक्त मीमांस-
कोंकी उन अनाचारसमर्थक क्रियाओंकी आलोचना है जिनमें मांसभक्षण,
मदिरापान भौर मेथुन-सेवनको दोष न मानकर उनका खुले आम समर्थन
किया ह ।› समन्तभद्र कहते हँ कि उक्त परवृत्तियां निश्चय ही रोककै पतन-
को कारण है, ककि जगत् स्वभावतः स्वच्छन्द वृत्ति है ओर उसे कहींसे
समर्थन ( असद् वृत्तियोको विघेयताका प्रोत्साहन } भिर जानेपर और
अधिक स्वच्छन्द ( स्वेच्छाचारी } हो जाता है । अतः हस तम (अज्ञानान्ध-
कार) को दूर करनेके लिए शम, सन्तोष, संयम, दया ओर समाधिरूप
वीर-शासन ही सुप्रभात है ।दस प्रकार संक्षेपमे हस प्रस्तावमें एकान्तमर्तोको सदोष ओर अनेकान्तमत
( वीरशासन ) को निर्दोष युक्तिपुरस्सर प्रतिपादन किया है । विस्तारपूर्वक
इन दोनोंका कथन समन्त दरक देवागममे उपलब्ध है ।२. प्रस्ताव--इस प्रस्तावमे ४०-६४ तक २५ कारिकाएँ हैं । ४० से
लेकर ६० वीं कारिका तक २१ कारिका्ओमिं वीर-जिनके द्वारा प्ररूपित
अथं तत्त्व ( वस्तुस्वरूप ) का सयुक्तिक विवेचन किया गया है, जिसका संकेत
अभेदभेदानभकमथतस्वं' ( का० ७ ) इस कारिकामें उपलब्ध है 1 वस्तुतः
इन कारिकाओंमें, वोर-शासनमें वस्तुका स्वरूप किस प्रकारका व्यवस्थित
है, इसीका मुख्यतया प्रतिपादन है--एकान्तवादोमे स्वीकृत वस्तुस्वरूपका१. न माक्त-मन्नणे दषो न मचे न च मैथुने ।प्रदृत्तिरेषा भूतानां-***॥
_>उद्धृत, युक्तय० टी० पृ० ४३1
User Reviews
No Reviews | Add Yours...