धर्म नीति | Dharm Niti

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Dharm Niti by मार्तण्ड उपाध्याय - Martand Upadhyay

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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नीति-धमं क. प्रारंभ जिस वस्तुसे हमारे मनमे अच्छे विचार उठते हो वह हमारी नीति, सदाचारका फल मानी जाती हे । दुनियाकं साधारण शास्र बताते है कि दुनिया कंसी ह । नीतिका मागे यह वताता ह कि दुनिया केसी होनी चाहिए । इस मागेके द्वारा हम यह्‌ जान सकते हे कि मनुष्यको किस तरहु आचरण करना चाहिए । मनुष्यके मनके भीतर सदा दो दर- चाजे होते हे--एकसे वह यह देख सकता है कि वह खुद कैसा है, दूसरेसे उसे केसा होता चाहिए इसकी कल्पना कर सकता है । देह, दिमाग और मन तीनोको अलग-अरग देखना-समभना हमारा काम हैँ। पर इतना ही करके रक जाय तो इस प्रकारका जान प्राप्त कर लेनेपर भी हम उसका कोड्‌ लाभ नही उठा सकते । अन्याय, दुष्टता, अभिमान आदिका क्या फक होता ৪




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