प्रेमशंकर व्यक्तित्व और रचना | Prem Shankar Vayktitav Aur Rachana

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Prem Shankar Vayktitav Aur Rachana by डॉ. वीरेंद्र मोहन - Dr. Virendra Mohan

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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पर विचार कर रहे हो या . .४.. ... ... की विधिध भाव भुमियो का मसथन कर रहे हों अथवा राजेश जोशी अरुण कमल आदि की नोटिस ले रहे हों सर्वन्न सजेना के एक स्तर पर होते हैं। इसीलिए डॉ० प्रेंमशंकर की आलोचना में विद्रोह और विनम्रता के तार एक साथ चलते हैं । चाहे वे अपनी स्थापनाओं को उस तरह से प्रचारित करने में रुवि न रखते हों पर अपने अन्दर एक ऐसा जुड़ाव महसुस करते हूं कि वे उनके सजातीय हैं । प्राय डॉ० प्रेमशंकर की आलोचनात्मक क्षमता का विकास वहाँ देखने को मिलता है जहाँ वे लोक भूमि और मानवीय जीवन के सौंदर्य की खोज करते हुए रचना से बार-बार टकराते हैं । भक्तिकान्य सम्बन्धी उनके अध्ययन ने उनके व्यक्तित्व की कई दिशाओं और रेखाओं का प्रकाशन किया है । इसे हम डॉ० प्रेमशंकर की आलोचना का द्वितीय उत्थान मान सकते हैं । यहाँ से वे अपने रूमानी यथाथेवाद से मुक्त होते हैं। इसकी शुरुआत को हिंन्दी स्वच्छन्दतावादी काव्य में स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। हिन्दी स्वच्छन्दतावाद को राष्ट्रीय चिन्ताधारा की भावशूमि से जोड़कर भारतीय समाज के जिंत स्तरों स्थितियों से परिचय प्राप्त किया है वह उन्हें प्रसाद के साथ निराला की यथार्थवादी चेतना से निकटता स्थापित करता है । इस प्रकार प्रसाद के काव्य को भी पुनर्मुस्याक्रन हो जाता है। वे आचार्य वाजपेयी की स्वच्छन्दतावाद सम्बन्धी निष्पत्तियों को आागें बढ़ाने को कार्य हिन्दी स्वच्छत्दताबादी काव्य में करते हैं। इस प्रकार हिन्दी स्वच्छत्दतावादी काव्य ही वास्तविक प्रस्थान है जिसके तार भर्क्तिकाव्य सम्बन्धी अध्ययन से जुड़ते हैं । ग्रह अध्ययन-विकास है पर भक्तिकाव्य के सन्दर्भ में एक नये मूल्यांकन का परिरदुश्य भी | भक्तिकाव्य डॉ० प्रेमशंकर के लिए मिलानेवाला बिन्दु है। इसीलिए वे सॉस्कतिक इतिहास की चेतना से जुड़ सके जीवन के लर्जित संस्कारों से भी इस चेतना का सम्मिलन हुआ । फलत भक्तिकाव्य सम्बन्धी उनका अध्ययन अपनी सीमा का विस्तार कर सका । अपनी सांस्कृतिक चेतना के कई धरातलों से डॉ ० प्रेमणंकर की आलोचना ने सांस्कृतिक जीवन की भी खोज की है। भक्तिकाव्य के जिस पक्ष को अभी तक इतिहास से परिचित नहीं कराया जा सका था उसके पास तक वे गये । इतिहासकारों की उपनिवेशवादी -ताम्राज्यवादी दुष्टि के विरुद्ध एक भारतीय इतिहास दृष्टि भी विकसित की । दर्शन के जिन प्रश्नों पर सिद्धास्तों के जिन बिन्दुओं से जुड़ने की जरूरत थी उन्हें स्वीकार किया । इस प्रकार भक्ति खिन्तन के सुंत्रों को खोजकर उनके मानवीय और वैश्विक धघरातल को सामने ला सके । उसकी सीमाओं को भी स्वीकार कर सके । निश्चित रूप से भक्तिकाव्य की इस पी को डॉ० प्रेमशंकर ते समझा है । इसीलिए वे भक्तिकाव्य को भी समझ सके । हिन्दी स्वच्छन्दतावादी काव्य के सन्दर्भ में डॉ० प्रेमशंकर स्वच्छुत्दतावादी 16 / प्रेमशंकर व्यक्तित्व और रचना




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