ज्ञान - ज्योति | Gyan Jyoti

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Gyan Jyoti by बी. नन्दलाल - B. Nandlal

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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সি >>. >> >> >> <- ५ सहियार ! रचयिता-- ब्रह्मचारी नन्दलाठ महाराज । पु सोरठा--- ज्ञानहिं गुन परतक्ष, षट-द्रव्योको छोकता। स्व पर प्रकाशक स्वच्छ, नमो ज्योति लख! शाश्वता ॥।१॥। दोहा २ अदूभुन रला ज्ञानक, परिणति क्रिया विचित्र । जेय लखे ज्ञायक रहै, सहज स्वभाव पत्रित्र ॥ ४ ह कम कृत बहु भाव यद, जीव-मांय सद्भाव । ऊपर ही ऊपर निरं, বল विमात्री भाव ।! र परजय सदा अनिल है, जा विभाव लहलाय । धर विवेक टुक देखते, मिथ्या-भाव १७ मिथ्या मावहि बंध है, सम्यक भव अवध । ज्ञान मात्र रस स्वादते, वीतराग पराय ॥ संबंध ॥ वीतराग रस सरस निज, श्रद्धे! जाने! जोय । सम्यक चारित दतू समय, সত অলিহাব होय ॥ \9 दशन ज्ञान चरित्र ये, जीवहिके प्रणाम । सम्यक, मिथ्या जानिया; निजपर आशत नाम ॥ ८ {निजको निज जान विना, पर-निज जानं जोय: मिथ्यादर्श जीव सब, इस हीं कारण होय ॥ ९, जो निजको निज हो जप, पर जानं पर-जब्ब । भूल मिर्ट भूले नहीं, सम्यकदष्टी तन्व ॥ সম €0 পপ ने 222 > ल ५




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