भारतीय पुरातत्व | Bharatiya Puratatva

55/10 Ratings. 1 Review(s) अपना Review जोड़ें |
श्रेणी :
Book Image : भारतीय पुरातत्व - Bharatiya Puratatva
[adinserter block="2"]

लेखक के बारे में अधिक जानकारी :

No Information available about आचार्य जिनविजय मुनि - Achary Jinvijay Muni

Add Infomation AboutAchary Jinvijay Muni

पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

(Click to expand)
१० ] जवाहिरलाल जन भारत-जर्मेन मित्रता बढ़ाने और हृढ़ करने की हृष्टि से एक राष्ट्रीय भावना-युक्त मुस्लिम “मित्र की सहायता से हिन्दुस्तान हाउस के नाम से एक संस्थान की स्थापना की ।मुनिजी को लगा कि जमंनी में गांधीजी, रवीन्द्रनाथ ठाकुर तथा भारत के वारे में जानने कीतीत्र जिज्ञासा है, इसकी पूर्ति के लिए विचार-विनिमय का एक केन्द्र ग्रावश्यक है | दूसरी वात यह अनुभव में आई कि जर्मनी में भारतीय काफी संख्या में रहते हैं तथा श्राते-जाते हैं, इनके आपस में मिलने श्रौर ठहरने का भी कोई स्थान नहीं है । तीसरी वातत यहु कि इस सारे विचार-विनिमय श्रौर संपकं मे भोजनालय का महत्वपूं स्थान है जिसमें निरामिप भोजन की भी व्यवस्था हो । इन तीनों कमियों की पूर्ति की हष्टि से - २४ अगस्त १६२८ को इस हाउस का उद्घाटन श्री शिवप्रसाद गुप्त के हाथों हुआ । हिन्दुस्थान हाउस बलिन में भारत- जमंन संपर्क और सुविधा का उत्तम केन्द्र वना और मुनिजी के भारत आ जाने के बाद भी भारत के अनेक गण्य-मान्य नेता, विद्यार्थी, व्यापारी आदि उससे लाभान्वित होते रहे । पिछले महायुद्ध के श्रवसर प२ नेताजी सुभापचन्द्र बोस भी कुछ समय वहाँ रहे थे । |मुनिजी १६२६ के दिसम्बर मास में जमंनी से वापिस लौटे और लाहौर के कांग्रेस अधिवेशन में शामिल हुये । लाहौर-कांग्रे स के द्वारा पूर्ण स्वाधीनता का प्रस्ताव स्वीकार किया गया । मुनिजी गाँधी जी से मिले झौर उन्होने पूनः जमनी जाने का श्रना इरादा प्रकट किया तो महात्मा जी ने कहा--अब हमें देश में ही तुम्हारे जैसे लोगों की अत्यंत आ्रावश्यकता है । मैं तुम्हें विदेश जाने की कैसे संलाह दे सकता हं ? फलतः मूनिजी का जर्मनी जाने का विचार समाप्त हो गया । ।कलकत्ते के प्रमुख जैन साहित्यानुरागी श्री बहादुर सिह सिंघी के निमंत्रर पर मुनिजी १६३० में कलकेत्त गये और वहाँ से वे शांति निकितत गये और अपने चिर-परिचित मित्र श्री क्षिति मोहन से वहीं मिले । गुरुदेव उस समय बाहर गये हुये थे | शांति तिकेतन को देखकर मुनिजी का हृदय हपित हुआ और यह भाव उठा कि इस तपोदन में ४-६ महीने रहकर जीवन मे समृद्धि एवं मूल्यवान्‌ स्पृतियों की वृद्धि प्राप्त करनी चाहिये | शांति निकेतन से लौटने पर श्री सिंघी ने उनसे कहा कि वे अपने पुज्य पिता की स्मृति में जान-अ्सार एवं साहित्य-प्रकाशन का कोई सुधार-कार्य करने की सोच হই ই । विशद चर्चा और विंचार-विनिमय के पश्चात्‌ शांति निकेतन में सिंघी जैन ज्ञानपीठ की स्थापना की योजना वनी और मुनिजी ते अपनी सवाएं इस कार्य के लिए अपित करना स्वीकार किया )इसी वीच १४ मार्च को गांधीजी नै नमक सत्याग्रह के लिए “दांडी कूच' का प्रारंभ कर दिया ।इससे स्वाभाविक रूप से हो गुजरात में बड़ी हलचल मची । घरासना का सरकारी नमक डिपो. सत्याग्रहियों ककायं का मुच्य क्षेत्र बना । मृनिजो भौ ७१ स्वयं सेवकों की बड़ी टोली के साथ धरासना के लिए परहमदाबाद से रवाना, हुए, पर गाड़ी रवाना होने के १५-२० मिनट बाद ही एक छोटे स्टेशन पर गिरफ्तार कर लिये गये और वक्तव्य लेकर तुरंत ही उन्हें ६ मास के सपरिश्रम कारावास की सजा दे दी गई । उन्हें ए क्लास दिया गया । उसी रात वे लोग वम्वई में “वरली चाल” की काम-चलाऊ जेल में लाये गये श्रीर कुछ दिन बदा रखकर उन्हें तासिक जैल यें भेज दिया गय) । वहाँ श्री जमतालाल बजाज, श्री नरीमान, डा5 चोकसी, थी रणछोड़ माई सेठ, श्री मुकुद मालवीय आदि भी साथ में थे ।नासिक जैल में ही मुनिजी का परिचय श्री कन्दैयालाल मारिक्य लाल मुशी से हुआ जो बीरे २ उन्मुक्त नदा में विकसित होता गया | सं० १६८६ की विजया दशमी को वे जेल से छूटे श्री जमना लाल




User Reviews

No Reviews | Add Yours...

Only Logged in Users Can Post Reviews, Login Now