इन्सान की कहानी | Insan Ki Kahani

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Insan Ki Kahani by मुल्कराज आनन्द - Mulkraj Anand

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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पहुला अध्याय सृष्टि का आारम्भ कर कहते हैं कि एक ऐसा भी जमाना था जब कहीं कु नहीं था या कुछ था जिसके बारे में हम कुछ नहीं जानते । इसे कोन जानता है? कौन इसके बारे में कुछ बता सकता है? इसकी उत्पत्ति कैसे हुई ? कौन जानता है यद्द कहाँ से उपजी है? यह सष्टि कहाँ से आई ? ऋग्वेद के कवि ने रष्टि-स्तोत्र में यही प्रश्न पृछे थे । ओर जब वह इस पहेली को हल करने में असमर्थ रहा तो उसने सृष्रि के आरम्भिक रचना-क्रम के बारे में झलुमान लगाने की कोशिश की । उसने सोचा कि न तो चहद स्थिति ऐसी थी कि जिसमें किसी चीज़ का स्तित्व ही न रददा दो थर न किसी चीज़ का श्रस्तित्व दी था। न तो वायु थी श्र न उसके परे का झाकाश | यह गति- वबक्र कैसा और क्या था ? और कहाँ था ? कौन इसे प्रेरित कर. रहा था ? क्‍या वद्दाँ जल और अथाद्द खाइयाँ थीं ? झाज भी हमें उस अतीतकालीन ऋषि से षिक कुछ मालूम नहीं है । ससिक कि छाब भी हसारे मस्तिष्क में सिफ सवाल उठ सकते हैं और जवाब के लिए अटकलबाजी दही हमारे काम आ सकती है । चूँ कि झंव विज्ञान हमारा सहायक है इसलिए हम ञाज शायद कुछ अधिक सही अनुमान लगा सकते हैं । किन्तु हमारा सारा ज्ञान उसी समय से आरम्भ होता दै जब इन्तान प्रथ्वी पर ाया श्र उसने सोचना शुरू किया । इन्सान के थाने के पहले कुछ भी मालूम नहीं था क्योंकि वी जों के बारे में ज्ञान प्राप्त करने चाला कोई था ही नहीं । ६




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